निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए व प्रश्नों के उत्तर उपयुक्त विकल्पों द्वारा दीजिये-
ईर्ष्या में प्रयत्नोपादिनी शक्ति बहुत कम होती है। उसमें वह वेग नहीं होता जो क्रोध आदि में होता है क्योंकि आलस्य और नैराश्य के आश्रय से तो उसकी उत्पत्ति ही होती है। जब आलस्य और नैराश्य के कारण अपनी उन्नति के प्रयत्न करना तो दूर रहा, हम अपनी उन्नति का ध्यान तक मन में नहीं ला सकते, तभी हारकर दूसरे की स्थिति की ओर बार-बार देखते हैं। और सोचते हैं कि यदि उसकी स्थिति न होती तो हमारी स्थिति जता वैसी रहने पर भी बुरी न दिखाई देती। अपनी स्थिति को ज्यों की त्यों रखकर सापेक्षिकता द्वारा संतोष लाभ करने का ढीला यत्न आलस्य और नैराश्य नहीं है तो और क्या है? जो वस्तु उज्ज्वल नहीं है उसे मैली वस्तु के पास रखकर हम उसकी उज्ज्वलता से कब तक और कहाँ तक संतोष कर सकते हैं? जो अपनी उन्नति के प्रयत्न में बराबर लगा रहता है उसे न तो नैराश्य और न ही हर घड़ी दूसरे की स्थिति से अपनी स्थिति के मिलान करते रहने की फुरसत ईर्ष्या की सबसे अच्छी दवा है उद्योग और आशा। जिस वस्तु के लिए उद्योग और आशा निष्फल हो उस पर से अपना ध्यान हटाकर दृष्टि की अनन्तता से लाभ उठाना चाहिए।
जिससे ईर्ष्या की जाती है उस पर ईर्ष्या का प्रभाव क्या पड़ता है यह भी देख लेना चाहिए। ईर्ष्या अप्रेष्य मनोविकार है। किसी मनुष्य को अपने से ईर्ष्या करते देख हम भी बदले में उससे ईर्ष्या नहीं करने लगते हैं। दूसरे को ईर्ष्या करते देखकर हम उससे घृणा करते हैं। दूसरे की ईर्ष्या का फल भोगकर हम उस पर क्रोध करते हैं जिससे अधिक अनिष्टकारिणी शक्ति होती है। अतः ईर्ष्या ऐसी बुराई है जिसका बदला यदि मिलता है तो कुछ अधिक ही मिलता है। इससे बात का आभास होता है कि प्रकृति के कानून में ईर्ष्या एक पाप या जुर्म है। अपराधी ने अपने अपराध से जितना कष्ट दूसरे को पहुँचाया, अपराधी को भी केवल उतना ही कष्ट पहुंचाना सामाजिक न्याय नहीं है, अधिक कष्ट पहुँचाना न्याय है, क्योंकि निरपराध व्यक्ति की स्थिति को अपराधी की स्थिति से अच्छा दिखलाना न्याय का काम है।