दिए गए गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा पूछे गए प्रश्न के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प का चयन करें।
कानून के व्याख्याकार मानते हैं कि हमारे कानूनों का मूल स्त्रोत परंपरा, समाज में प्रचलित प्रथाएँ, रीति-रिवाज, आचार-व्यवहार और रुढ़ियाँ हैं। जब कोई प्रथा लंबे अरसे से, जहाँ तक याद पड़े समाज में चलती आ रही हो, उसे कुछ मानदंडों पर खरा उतारने पर कानून का दर्जा मिल जाता है। विधि के लिखित और संहिता बद्ध होने से पूर्व एक लंबे समय तक रूढ़ियाँ ही समाज का आधार रहीं। हमारे सभी पर्सनल लॉ इसी प्रकार बने हैं। लिखित रूप में उन्हें कानूनी जामा पहनने के लिए कुछ महत्वपूर्ण तत्वों को अवश्य देखा जाता है। उनका तर्क संगत होना सबसे पहली शर्त है, क्योंकि कानून तर्कहीन नहीं हो सकते। प्रचलित लिखित कानूनों की विरोधी प्रथा कानून नहीं बन सकती। 'सती' जैसी तर्कहीन प्रथा लंबे अरसे से इधर-उधर प्रचलित होने पर भी कभी कानून नहीं बन सकी बल्कि उसके विरोध में अवश्य कानून की आवश्यकता पड़ गई। जनजीवन के अनुकूल होना उसकी पहली आवश्यकता होनी चाहिए क्योंकि कानून जनजीवन की सुविधा के लिए ही बनाए जाते हैं। जो प्रथाएँ कानून बनी उनका इतिहास हमारे सामने है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में ऐसे कई उल्लेख मिलते हैं जब समाज में प्रचलित प्रथाएँ कानून बन गईं।