निर्देश : नीचे दिए गए गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
भाषा का प्रश्न अत्यन्त संवेदनशील है, अतएव इस पर बड़ी सूझ-बूझ, सहानुभूति और धैर्य से विचार करना आवश्यक है। इस सम्बन्ध में जो भी समाधान ढूँढ़ा जाए, उससे यह आभास नहीं होना चाहिए कि एक भाषाई गुट की विजय हुई है और दूसरे की पराजय। कोई भी सर्वमान्य हल निश्चय ही उस भारतीय राष्ट्रीयता की विजय का द्योतक होगा, जिसने अतीत में समय-समय पर अपनी शक्ति प्रदर्शित की है। हमने राष्ट्रीयता तो प्राप्त कर ली है, एक राष्ट्रीय पताका भी अपना लिया है, परन्तु हम देश की एक सम्पर्क भाषा, संघ की राजभाषा अपनाने के अपने अभीष्ट लक्ष्य पर अभी तक नहीं पहुँच पाए हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें अनुकूल वातावरण तैयार करने की जी तोड़ कोशिश करनी होगी। ऐसे मामलों में जल्दबाजी आत्मघाती है, क्योंकि उससे अनेक समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं, खास तौर पर लोगों के मन में सन्देह और अविश्वास उत्पन्न हो जाता है और ये दोनों ही राष्ट्रीय एकता के कट्टर दुश्मन हैं।