निर्देशः निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का राष्ट्रपतिकाल पूर्ण होने पर वे पटना के सदाकत आश्रम पहुंचे। उन्हें उस स्थान से अत्यधिक स्नेह था, क्योंकि एक युवा क्रांतिकारी के रूप में वे वहाँ रह चुके थे। एक दिन उनका एक किसान मित्र किसी केस के सिलसिले में पटना आया था। किसान ने सोचा कि अपने पुराने मित्र राजेंद्र से मिल लेते हैं। देखें, पहचानता है या नहीं? वह सदाकत आश्रम पहुँचा और सिपाही से अंदर जाने के लिए अनुमति माँगी। किसान से सिपाही ने प्रयोजन पूछा। किसान बोला-"बस, हमें राजेंद्र से मिलना है।" सिपाही ने कहा, "अभी नहीं मिल सकते। साहब आराम कर रहे हैं।" किसान नाराज़ होते हुए बोला-"अरे भाई, हम लोग आंदोलन में साथ थे, मिलने दो।" सिपाही ने कहा-"जाओ-जाओ, सभी ऐसा ही कहते हैं।" तभी राजेंद्र बाबू ने भीतर से किसान मित्र की आवाज़ पहचानकर उसे अंदर आने देने को कहा। किसान अंदर पहुँचा और यह देखकर हैरान रह गया कि राजेंद्र बाबू बाँस की खटिया पर दरी डालकर लेटे हुए हैं। इतने बड़े पद पर रहने के बाद भी राजेंद्र बाबू का साधारण रहन-सहन देख किसान चकित रह गया। राजेंद्र बाबू उसका हाथ पकड़कर रुआँसे होकर कहने लगे-"हम अपने देश के लिए कुछ खास नहीं कर पाए।" किसान ने जब उनके बड़े महत्त्वपूर्ण राष्ट्रहितकारी कार्यों की चर्चा की, तब भी वे खेद जताते रहे कि हम कुछ नहीं कर पाए। वस्तुतः देश और समाज के लिए महत्त्वपूर्ण योगदान देकर भी स्वयं को अकिंचन मानने की प्रवृत्ति सही मायनों में बड़प्पन का लक्षण है।