निम्नलिखित अवतरण को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध अनेक दृष्टियों से भारतीय इतिहास का अत्यंत उत्तेजनापूर्ण, अशांत और सामाजिक संक्रांति का काल था। 1857 के स्वाधीनता युद्ध के बाद, महारानी विक्टोरिया के घोषणा - पत्र के बावजूद सामान्य जनता में ब्रिटिश साम्राज्य की क्रूर एवं दमनकारी नीतियों के फलस्वरूप विरोध और घृणा का भाव गहराया था। अंग्रेज़ अधिकारियों और उनके परिवारों की रक्षा के पुरस्कार स्वरूप जिन ज़मीदारों और सामंतों को पदों, उपाधियों और ज़मीन के पट्टों का अधिकार मिला था, वह अपने ब्रिटिश स्वामियों को खुश करने के लिए भारतीय जनता के उत्पीड़न में उनके सहायक और सहयोगी थे। इस तरह जनता इस उत्पीड़न की दोहरी मार से त्रस्त थी। इन्हीं के साथ कुछ मध्य वर्गीय पढ़े-लिखे लोग भी नौकरियों और अन्य सुविधाओं के लोभ में ब्रिटिश शासन के उत्साही समर्थकों के रूप में सामने आ रहे थे । ऐसा लगता था कि समूचा भारतीय समाज जैसे दो भागों में बंट गया था इन्हीं सबकी प्रतिक्रिया में बहुत बड़ी संख्या में वह लोग भी थे जो पश्चिम से इस सांस्कृतिक मुठभेड़ के बाद अपनी सांस्कृतिक जड़ों की तलाश और वापसी की दिशा में सक्रिय थे। 1875 में आर्य समाज की स्थापना हो चुकी थी। उसकी तत्कालीन भूमिका को देखते हुए आर्य समाज एक प्रगतिशील सामाजिक-धार्मिक आंदोलन के रूप में अपनी पहचान बना रहा था। बाल विवाह का विरोध, विधवा विवाह का समर्थन और स्त्री शिक्षा की आवश्यकता आदि उसके कुछ ऐसे ही प्रगतिशील पक्ष थे।