हास्य रस किस पंक्ति में है?
1
संज्ञा-रहित तत्काल ही वह फिर धरा पर गिर पङी।
उस समय मूर्छा भी अहो! हितकर हुई उसको बङी।।
उस समय मूर्छा भी अहो! हितकर हुई उसको बङी।।
2
तेहि समाज बैठे मुनि जाई। हृदय रूप-अहमिति अधिकाई।।
तहँ बैठे महेस-गन दोऊ! विप्र बेस गति लखइ न कोऊ।।
तहँ बैठे महेस-गन दोऊ! विप्र बेस गति लखइ न कोऊ।।
3
उस काल मारे क्रोध के तनु काँपने उनका लगा।
मानो हवा के जोरे से सोता हुआ सागर जगा।
मानो हवा के जोरे से सोता हुआ सागर जगा।
4
सिर पर बैठो काग आंखि दोउ खात निकारत
खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनन्द डर धारत।
खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनन्द डर धारत।