निर्देश: दिए गए गद्यांश के आधार पर प्रश्न का उत्तर दीजिये-
कविता के मर्मज्ञ और रसिक स्वयं कवि से अधिक महान होते है। संगीत के पागल (सुनने वाले) ही स्वयं संगीतकार से अधिक संगीत का रसास्वादन करते हैं। यहाँ पूज्य नहीं, पुजारी ही श्रेष्ठ है। यहाँ सम्मान पाने वाले नहीं, सम्मान देने वाले महान हैं। स्वयं पुष्प में कुछ भी नहीं है, पुष्प का सौंदर्य उसे देखने वाले की दृष्टी में है। दुनिया में कुछ भी नहीं है, जो कुछ भी है हमारी चाह में, हमारी दृष्टी में है। यह अद्भुत भारतीय व्याख्या अजीब सी लग सकती है, पर हमारे पूर्वज सदा इसी पथ के पथिक रहे हैं। उत्तम गुरु में जाति भावना भी नहीं रहती, कितने ही मुसलमान पहलवानों के हिंदू चेले रहे हैं और हिंदू संगीतकारों के मुसलमान शिष्य रहे हैं। यहाँ परख गुण की, साधना की और प्रतिभा की होती है। भक्ति और श्रद्धा की ही कीमत है, न कि जाति-संप्रदाय, आचार-विचार या धर्म की। मुझे पढाया-लिखाया था- विद्वान मुसलमान ने ही और आज मैं स्थान पर पहुँचा हूँ, जो सम्मान और प्रति मुझे मिली है, उस सबका श्रेय मेरे उन्हीं का है।