निर्देश: अधोलिखित गद्यांश को ध्यान से पढिए और नीचे दिये गए प्रश्नों के उत्तर गद्यांश के आधार पर दीजिए।
कुछ जिज्ञासाएँ अभी तक अनुत्तरित हैं। विज्ञान, दर्शन, समाजशास्त्र सभी ईमानदारी से स्वीकार करते हैं उन विषयों पर अपनी सीमाओं को। संपूर्ण विश्व ब्रह्मांड निस्सीम है। उत्पत्ति, समय काल, सभी धुंध में या उससे भी परे। ज्ञान के जितने भी साधन या वाहक हैं - सिर्फ आँखें मिचमिचाकर रह जाते हैं। ज्ञान का साहस, दंभ, पाखंड कुछ भी नहीं चलता। विवशता भी नहीं है, साधनहीनता भी नहीं। सिर्फ स्वीकारोक्ति है कि हम नहीं जानते। अभी तक नहीं जानते। ऐसे में एक मानव इस विश्व में अपने स्थान, अपनी अल्पकालता, अपनी क्षणभंगुरता के प्रति प्रश्नकुलता से आगे नहीं जाता। एक तटस्थता, अहंकारहीनता और निर्मम उत्सुकता ही मनुष्य को संवेदित और प्रबुद्ध रखती है। यही है धर्म का वह वैज्ञानिक अध्यात्म पक्ष जहां ईश्वर, अनीश्वर की स्थिति स्थगित रहती है। इसके बाद दर्शन और व्याख्या शुरू होती है। रहस्य का भेद खोलने की कोशिशें। ईमानदार दर्शन की प्रारंभिक स्थिति जो बहुत शुद्ध और लंबी जिज्ञासा से प्रेरित होती है। ईश्वर का जन्म इसी स्थिति में होता है। इसी रास्ते पर थोड़ा आगे अध्यात्म का एक भिन्न रूप शुरू होता है। आत्मा, परमात्मा और विलय के सिद्धान्त और प्राप्ति के साधन।