Comprehension Passage

रीतिकालीन हिन्दी कविता का एक लक्षण यह भी है कि उसके पिछले वर्षों की कविताएँ रीति के बन्धनों से बहुत कुछ मुक्त हो जाती हैं एवं उनमें नया आनंद झलकने लगता है, जो परिमार्जित शैली में ह्रदय की सच्ची अनुभूतियों के लिखने का आनन्द है। आलम, बोधा और घनानंद इसी आनंद के कवि हैं। आश्चर्य की बात है कि जैसे अठारहवीं सदी में इन कवियों ने कविता में फिर से प्राण डाल दिए, वैसे ही इस कला में पहाड़ी-कलम (कांगड़ा शैली) के चलते चित्रकला भी सजीव हो उठी। और जैसे आलम, बोधा और घनानंद में जो आकर्षण है, उसका उद्गम सूफी भाव-धारा और भारतीय भाव-धारा का मिलन बिंदु है, वैसे ही पहाड़ी कलम में भी ताजगी मुग़ल-कलम से आई। पहाड़ी कलम मुगल कलम की सद्यः सन्तति है एवं यही कलम अजन्ता के बाद भारत की सबसे उच्च कलामय उड़ान भी है। घनानन्द की कविता में जो हार्दिकता और उन्मुक्तता है, वही हार्दिकता और उन्मुक्तता पहाड़ी शैली के गुण हैं। ये कलाकार जनजीवन के बहुत समीप थे। उन्होंने अनेक विषयों पर चित्र बनाए । हिन्दी के प्रमुख और साधारण कवियों से लेकर जीवन की दैनिक चर्या ओर शबीह तक, ऐसा एक भी विषय नहीं है, जिसे इस शैली के चित्रकारों ने छोड़ा हो।

उपर्युक्त गद्यांश से संबंधित प्रश्न में दर्ज हैं-

अजन्ता के बाद भारत की सबसे उच्चतम कलामय उड़ान संभव हुई-

1
मुग़ल कलम में 
2
पहाड़ी कलम में
3
सल्तनत कलम में
4
मैदानी कलम में
5
उपर्युक्त में से कोई नहीं

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