दिए गए गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा पूछे गए प्रश्न के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प का चयन कीजिए।
माटी के बरतनों और माटी की मूर्तियों की एक सुदीर्घ परंपरा हमारे देश में रही है। आधुनिक ज़माने में भी माटी की यह महिमा हमारे देश में कम नहीं हुई है। आधुनिक उपकरणों ने शहरी जीवन में माटी की जगह भले ही कुछ छीनी हो, लेकिन यहाँ भी कम-से-कम पानी से भरा मटका अभी भी बचा हुआ है, जिसका पानी बहुतों को शीतलता देता है। माटी के गमले भी क्या शहर - क्या गाँव, सब जगह दिखाई पड़ते हैं। माटी की सज्जात्मक वस्तुएँ भी शहरों में काफ़ी बिकने लगी हैं। लेकिन माटी की चीज़ों के इस प्रचलन से यह नहीं मान लेना चाहिए कि हमारे कुंभकार की हालत बेहतर हो गई है। यह एक सच्चाई है कि अब कुंभकार के पेशे को स्वयं कुंभकारों की नई पीढ़ियाँ चाव से नहीं अपनाना चाहती। यह भी एक सच्चाई है कि और चीजों की कीमतें चाहे जितनी बढ़ी हों, लेकिन मिट्टी के बरतनों और मिट्टी से बनाई गई चीजों की कीमतें बढ़ी भी हैं तो बहुत ज्यादा नहीं। हम सबके मन में रहता है कि क्या हुआ, यह माटी का ही तो है। सच पूछिए तो बहुत ज्यादा राशि की उम्मीद वह कभी करता भी नहीं रहा। और कुंभकार ने माटी से बहुत गहरे लगाव व प्रेम का रिश्ता रखा है।