नीचे दिए गये गद्य को पढे और पुछे गये प्रश्नो के उत्तर दे:
खंडकाव्य प्रबंध कविता का ही दूसरा प्रकार है। संस्कृत में रूद्रट ही पहले ऐसे आचार्य हैं जिन्होंने काव्य को प्रबंध एवं खंड में बाँटा तथा उन दोनों के अंतर को स्पष्ट करना चाहा है। उनके अनुसार महाकाव्य में एक ओर तो एक से अधिक फलों की और दूसरी ओर एक से अधिक रसों की भी व्यवस्था हो सकती है, किंतु लघुकाव्य यानि खंडकाव्य में ऐसी कोई गुंजाइश नहीं होती। खंडकाव्य में तो एक ही फल और एक ही रस को देखा जाता है। आचार्य विश्वनाथ के अनुसार खंडकाव्य में किसी एक प्रधान घटना का वर्णन होता है, उसमें जीवन के किसी एक पक्ष को लेकर कथा चलती है। खंडकाव्य की सफलता जिन तत्त्वों पर निर्भर करती है वह हैं - संक्षिप्त आकार, जीवन-खंड को ही लक्ष्य में रखना इसलिए संक्षिप्त कथानक, कथा-संगठन में अधिक से अधिक प्रभावान्विति, चरित्र के भावाभिव्यंजन पक्ष पर बल, जीवन के किसी न किसी सत्य को उद्घाटित करने की क्षमता, वस्तु की अपेक्षा भाव-बंध पर बल आदि । प्राचीन हिंदी की कुछ 'रासो' रचनाएँ इस विधा की आरम्भिक रचनाएँ हैं। इनमें अब्दुल रहमान का 'संदेश रासक', नरपति नाल्ह का 'बीसलदेव रासो' आदि के नाम गिनाये जा सकते हैं। इनमें कलात्मकता का अभाव है, फिर भी 'संदेश रासक' को विशेष रूप से खंडप्रबंध कविता की पहली रचना कहा जा सकता है। गोस्वामी तुलसीदास कृत 'पार्वती मंगल' और 'जानकी मंगल' उल्लेखनीय खंडकाव्य हैं। नई कविता धारा में अनेक खंडकाव्य मिलते हैं। जिनमें 'संशय की एक रात' (नरेश मेहता), 'आत्मजयी' ( कुँवर नारायण) आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।