निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और पूछे गए प्रश्नों के सही उत्तर चुनिए।
जनसंख्या की वृद्धि भारत के लिए आज एक विकट समस्या बन गयी है। यह समाज की सुख-सम्पन्नता के लिए एक भयंकर चुनौती है। महानगरों में कीड़ों-मकोड़ों की भाँति अस्वास्थ्यकर घोंसलों में आदमी भरा पड़ा है। न धूप, न हवा, न पानी, न दवा। पीले-दुर्बल, निराश चेहरे | यह संकट अनायास नहीं आया है। संतान को ईश्वरीय विधान और वरदान मानने वाला भारतीय समाज ही इस 'रक्तबीजी संस्कृति' के लिए ज़िम्मेदार है। चाहे खिलाने को रोटी और पहनाने को वस्त्र न हो, शिक्षा को शुल्क और रहने को छप्पर न हो, लेकिन अध-भूखे, अध-नंगे बच्चों की कतार खड़ी करना हर भारतीय अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है। यदि इस जनवृद्धि पर नियंत्रण न सका तो हमारे सारे प्रयोजन और आयोजन व्यर्थ हो जायेंगे। धरती पर पैर रखने की जगह नहीं बचेगी। जब किसी समाज के सदस्यों की संख्या बढ़ती है तो उसे उनके भरण-पोषण के लिए जीवनोपयोगी वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है, परंतु वस्तुओं का उत्पादन तो गणितीय क्रम से होता है और जनसंख्या रेखागणित की दर से बढ़ती है। फलस्वरूप जनसंख्या और उत्पादन- दर में चोर-सिपाही का खेल शुरू हो जाता है। आगे-आगे जनसंख्या दौड़ती है और पीछे-पीछे उत्पादन-वृद्धि। वास्तविकता यह है कि उत्पादन वृद्धि के सारे लाभ को जनसंख्या की वृद्धि व्यर्थ कर देती है। जिसके परिणामस्वरूप वस्तुएँ अलभ्य हो जाती हैं। मँहगाई निरंतर बढ़ती रहती है। जीवन-स्तर गिरता जाता है। ग़रीबी, अशिक्षा, बेकारी बढ़ती चली जाती है। देश वहीं का वहीं पड़ा रहता है।