नीचे दिए गये गद्य को पढे और पुछे गये प्रश्नो के उत्तर दे:
महात्मा गाँधी की विचार पद्धति का व्यापक नाम गाँधीवाद है। मार्क्सवाद के समान कोई व्यवस्थित शास्त्रीय अध्ययन गाँधीवाद के पीछे नहीं है, इसी कारण उसमें किसी प्रकार की तर्कजन्य पद्धति का अभाव है। उसका आधार तर्क नहीं, स्वानुभूति है। इस विचार का प्रत्येक खंड आत्मशक्ति को लेकर चलता है। इसी कारण उसमें एक प्रकार की आध्यात्मिकता और विचार - स्वातंत्र्य है। गाँधीवाद को किशोरीलाल मशरूवाला ने तीन भागों में विभक्त किया है- वर्णव्यवस्था, ट्रस्टीशिप, विकेंद्रीकरण । वर्णव्यवस्था के अंतर्गत उन्होंने पारिश्रमिक की समानता का प्रस्ताव किया। ट्रस्टीशिप के अंतर्गत आत्मविश्वास के साथ समस्त प्राणिमात्र के कल्याण के लिए कार्य करना होता है। विकेंद्रीकरण के अंतर्गत उद्योगों का ही नहीं, राजसत्ता का भी विकेंद्रीकरण उनका अपना अभीप्सित था। गाँधीवाद की सबसे बड़ी देन उसकी यह विचारधारा है कि हमको साध्य के साथ-साथ साधन की पवित्रता का भी ध्यान रखना चाहिए। सर्वोदय गाँधी का सामाजिक आदर्श है। गाँधीवाद के मूल स्तंभ दो हैं, सत्य और अहिंसा । उन्होंने अहिंसा को सत्य का दूसरा पहलू कहा है। अहिंसा में प्रेम की संप्राप्ति भी है। यह प्रेम स्वार्थ, मोह, आसक्ति आदि से भिन्न होता है। इस अहिंसा में बैर - त्याग, चराचर प्रेम और पूर्ण निष्काम भाव का समन्वय है। ऐसी अहिंसा की प्राप्ति के लिए गाँधी ने आत्मशुद्धि को आवश्यक माना है और इसके लिए अहं के त्याग को अनिवार्य माना है।मार्क्सवाद के साम्यवाद के प्रति गाँधीजी का दृष्टिकोण सकारात्मक था किंतु इसका कारण था वर्गहीन समाज का आदर्श।