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गिरीश अस्थाना का 'धूपछाँही रंग' (1970) एक श्रेष्ठ उपन्यास है। युद्ध और दफ्तर की ज़िंदगी का इतने बड़े पैमाने पर चित्रण हिंदी के किसी अन्य उपन्यास में नहीं हुआ हैं। अनुभव की प्रामाणिकता, आसपास की चीज़ों के प्रति गहरी संवेदना, वस्तुओं को उनके सूक्ष्म ब्योरों के साथ प्रस्तुत कर देने की क्षमता, कथन की भंगिमा और सारे उपन्यास में व्याप्त सहजता का अंदाज़, यह सारी बातें पाठक को एक सुखद अनुभव से गुज़ारती हैं। इसके प्रथम खण्ड में द्वितीय महायुद्ध में जर्मनी और इटली की सेनाओं से लड़ती भारतीय फौज का चित्रण किया गया है। उपन्यासकार ने चित्रकार सुकांत के माध्यम से, जो इस युद्ध का चश्मदीद गवाह है, सैनिकों की भरती से लेकर युद्ध के अंतिम परिणाम तक का बहुत सजीव चित्रण किया गया है, उल्लेखनीय यह है कि इस युद्ध वर्णन में मानवीय संवेदना का पक्ष शुरू से अंत तक विद्यमान है। ब्रिटिश और भारतीय सैनिकों के बीच के सूक्ष्म तनाव, गोरों की धूर्तता और उनके जातीय दम्भ का संकेत देने में भी उपन्यासकार ने कलात्मक संयम का उदाहरण पेश किया है। उपन्यास के दूसरे खण्ड में उद्योगपतियों के समाज का चित्रण है। और यहाँ भी उपन्यासकार उतनी ही प्रामाणिकता और सूक्ष्मता से उद्योगपतियों के आपसी दाँवपेंच, उठा-पटक तिकड़म और भ्रष्टाचार का चित्रण करता है।