निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए व प्रश्नों के उत्तर दीजिये-
स्वतंत्रता आन्दोलन में आदिवासियों की भूमिका समझने के लिए उसकी पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। यह सच है कि आदिवासियों द्वारा चलाये गए आन्दोलन स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार स्थानीय स्तर पर ही लड़े गये। पूरे भारत की स्वतंत्रता के लिए आदिवासियों ने कभी अंग्रेजों के विरूद्ध युद्ध नहीं लड़े। इसका प्रमुख कारण है आदिवासी कई उपजातियों और समूहों में बटा हुआ था। भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन को खड़ा करने में आदिवासी आन्दोलनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ज़मींदारी क्षेत्रों में किसानों को उच्च लगान, अवैध करारोपण, मनमानी बेदखली और अवैतनिक श्रम का सामना करना पड़ता था। इसके अलावा सरकार ने भारी भू-राजस्व भी लगाया। आंदोलनों का उदय तब हुआ जब ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरूप पारंपरिक हस्तशिल्प और अन्य छोटे उद्योगों का दमन हुआ, जिससे स्वामित्व में परिवर्तन हुआ तथा किसानों पर कृषि भूमि का अत्यधिक बोझ एवं कर्ज बढ़ा एवं किसानों की गरीबी में वृद्धि हुई। ब्रिटिश सरकार की आर्थिक नीतियाँ ज़मींदारों और साहूकारों के पक्ष में थीं तथा किसानों का शोषण करती थीं। इस अन्याय के खिलाफ किसानों ने कई अवसरों पर विद्रोह भी किया। नील विद्रोह, बारदोली सत्याग्रह, पाबना आंदोलन और दक्कन दंगों में किसानों की मांगों को सुना गया और असहयोग आंदोलन के दौरान किसानों की मांगों को सुनने के लिये विभिन्न किसान सभाओं का गठन भी किया गया। असंख्य महिलाओं के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण ही आजादी का यह महान आंदोलन सक्रिय बन पड़ा। 1857 के विद्रोह में विश्व के सबसे महान् व शक्तिशाली साम्राज्य को चुनौती दी गई। 1857 के इस विद्रोह में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हज़रत महल जैसी वीरांगनाओं का योगदान विशेष उल्लेखनीय रहा। स्त्रियों ने देश के प्रति प्रेम भावना का परिचय देते हुए व उसे स्वतंत्र कराने के लिए सभी तरीको से अपना योगदान दिया। शांति प्रिय आंदोलनों से लेकर क्रांतिकारी आन्दोलनों में स्त्रियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।