निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सही / सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प का चयन कीजिए।
जीवन में संतुलन और समरसता की उपलब्धि के लिए आत्मरति और समाजरति की समानता महत्वपूर्ण है। आत्म शुद्धि, जो आंतरिक मानवीय गुणों जैसे कर्मण्यता, आत्मा की अनुभूति, और विवेक की उच्चता को दर्शाती है, यह स्वयंसेवा और आत्मिक विकास का प्रमुख मार्ग है। इसे प्राप्त करने का आधार मन के निरंतर चिंतन और शुद्धि से होता है। दूसरी ओर, समाज शुद्धि, जिसमें परोपकार, समाजिक न्याय, और आदर्श विकास की प्रक्रिया शामिल है, यह मानव समुदाय के समग्र स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा देती है।
समाजरति की संवर्धना केवल बाह्य सामाजिक उपायों जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, और आर्थिक स्थिरता से ही संभव नहीं है; बल्कि इसका आधार भी आत्मा की शुद्धि, सत्यनिष्ठा, और सहानुभूति जैसी आंतरिक गुणों से जुड़ा हुआ है। जीवन में विशेषतः आत्मिक और सामाजिक पहलुओं के बीच संतुलन बनाना, आत्म और समाज की संपूर्णता की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है।
आत्म और समाज की शुद्धि सद्भाव और परस्परता का मार्ग दर्शाती है। यह निर्णायक ढंग से प्रदर्शित करता है कि मानवीय खुशी और संतोष किसी भी व्यक्ति, समुदाय या समाज के लिए उपलब्ध है, बशर्ते कि वह आंतरिक और बाह्य स्वच्छता के महत्व को समझे और उसका पालन करे। आत्मा के जन्मजात गुणों की पोषण और समाज द्वारा उनकी स्वीकृति, यह मानवता की सार्वभौमिक सिद्धांतों की ओर एक महत्वपूर्ण यात्रा है, जो व्यक्ति और समुदाय दोनों के लिए स्थायी शांति और संप्रीति की ओर अग्रसर करती है।