निर्देश: निम्नलिखित अवतरण को पढ़कर सम्बद्ध वैकल्पिक उत्तरों में से सहीं उत्तर का चयन कर उसे चिन्हित करें।
मैथिलीशरण गुप्त गाँधी-युग के प्रतिनिधि कवि हैं-अपने जीवन के प्रौढ़काल में ही वे इस गौरव के अधिकारी हो गए थे। गाँधी-युग का प्रतिनिधित्व एक सीमा तक सम्पूर्ण आधुनिक काल का प्रतिनिधित्व भी माना जा सकता है। गाँधी-युग की प्रायः समस्त मूल प्रवृत्तियाँ राष्ट्रीय, सामाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलन गुप्तजी के काव्य में प्रतिफलित हैं। यह प्रतिफलन प्रत्यक्ष भी है और परोक्ष भी। कुछ रचनाओं में युग-जीवन का स्वर मुखर है और उनमें वातावरण की हलचल का प्रत्यक्ष चित्रण किया गया है। इनमें कवि राष्ट्रकवि के दायित्व का भी पालन करता है। कुछ अन्य रचनाओं में युग-चेतन अत्यन्त प्रखर है, परन्तु वह प्रच्छन्न है। गुप्तजी के संस्कार मूलतः सामन्तीय थे और उनके घर का वातावरण वैष्णव था, तथापि वे समय के साथ चलने का निरन्तर प्रयत्न करते थे तथा देश के विभिन्न आन्दोलनों को समझने का भी प्रयत्न करते थे। उनकी प्रतिक्रिया प्रायः प्रखर और प्रबल होती थी। गाँधी-युग की समस्याओं का चित्रण प्रेमचन्द ने भी किया और अपने ढंग से प्रसाद ने भी। प्रेमचन्द की दृष्टि बहिर्मुखी थी, उनकी चेतना सामाजिक-राजनीतिक थी। प्रसाद की दृष्टि अन्तर्मुखी थी और उनकी चेतना एकान्त रूप में सांस्कृतिक थी। गाँधी-युग की प्रायः सभी प्रमुख समस्याओं को उन्होंने ग्रहण किया, परन्तु उनके बहिरंग में उनकी रुचि नहीं थी। अपने नाटकों में प्रसाद ने उन्हें पूर्णतः सांस्कृतिक रूप में प्रस्तुत किया है और कामायनी में आध्यात्मिक धरातल पर। अपने उपन्यासों में प्रसाद उन्हें राजनीतिक सामाजिक धरातल पर ग्रहण करते हैं, परन्तु शीघ्र ही उनके बहिरंग रूपों को भेदकर उनमें निहित सांस्कृतिक तत्वों का चित्रण भी करने लगते हैं। गुप्तजी की स्थिति मध्यवर्ती है, उनका दृष्टिकोण राष्ट्रीय संस्कृति है। उनमें न तो प्रेमचन्द के समान व्यावहारिकता का आग्रह है और न प्रसाद की तरह दार्शनिकता का। उनमें सगुण तत्व अधिक है। प्रेमचन्द में धर्म-भावना का अभाव है, तो प्रसाद में लोक-भावना का। गुप्तजी में लोक-चेतना का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत अधिक मिलता है।