सुमेलित कीजिए :

(क)

हे शरण दायिनी देवि !

तू करती सबका त्राण है।

तू मातृभूमि, संतान हम,

तू जननी, तू प्राण है।।

(i)

रोला

(ख)

चलि सखि देखत जाहिं,

पियां अपनै को खोरी।

बाजत ताल मृदंग, और

किन्नरि की जोरी।

(ii)

उल्लाला

(ग)

बाजहि जु बाजन सकल

सुर नभ, पुहुप अंजलि बरवही।

थकि रहे व्योम-विमान

मुनिजन, जय सबद करि हरषहीं।

(iii)

दोहा

(घ)

ए रे सुंदर साँवरे,

तैं चित लियो चुराइ।

संग सखा संध्य समय,

द्वारै निकस्यो आइ।

(iv)

हरिगीतिका

1
(क) - (i), (ख) - (ii), (ग) - (iv), (घ) - (iii)
2
(क) - (ii), (ख) - (i), (ग) - (iv), (घ) - (iii)
3
(क) - (ii), (ख) - (i), (ग) - (iii), (घ) - (iv)
4
(क) - (iv), (ख) - (i), (ग) - (ii), (घ) - (iii)

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