निर्देश: नीचे दिए गये गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा गद्यांश में वर्णित तथ्यों के आधार पर प्रश्नों के उत्तर दीजिए|
कार्य-कुशलता क्या है और कार्य-कुशल व्यक्ति कौन है, उसकी हम यहाँ पर विवेचना कर लें| कार्य कुशलता का पहला अंग तो यह है कि हम अपने कार्य को समय से निर्धारित कर उसे अच्छी तरह जानें| हम लोगों में अधिकतर लोग कार्य उठा तो लेते है, पर उसे अच्छी तरह जानते नहीं और न जानने का यत्न ही करते हैं| जब सफलता नहीं मिलती तो अपने को दोष न देकर हम दूसरे को दोष देते हैं, अपना हृदय कलुषित करते हैं और बार-बार कार्य बदलते हुए बड़े संताप में जीवन व्यतीत करते हैं| छोटे-बड़े सभी कामों में यह देखा जाता है| साधारण तौर से शायद यह समझा जाता है कि घास छीलना या झाड़ू देना बहुत सरल काम है| संभव है, हममें से बहुत से लोग उसे ऐसा समझते भी हों, पर यदि उन कामों को आजमाने के लिए किसी वक्त करने की कोशिश करें तो मालूम हो जाएगा कि वह कितना कठिन काम है और इसके लिए भी शिक्षा की कितनी आवश्यकता है| यदि हम लोग अपने-अपने काम के एक-एक अंग को अच्छी तरह समझें और उसमें प्रवीण होने का सदा ख्याल रखें तो हम अपनी और अपने काम दोनों की बहुत-कुछ वृद्धि और उन्नति कर सकते हैं|
कार्य-कुशलता छोटे और बड़े का भेद नहीं जानती| जो कार्य-कुशल होगा, वह आरंभ में कितना ही छोटा क्यों न हो, अवश्य उन्नति करेगा और जो नहीं होगा, वह आरंभ में चाहे कितना बड़ा क्यों न हो, अवश्य गिरेगा| इस कारण कार्य-कुशलता का प्रधान अंग परिश्रम है| यह संसार परिश्रम का है| जो परिश्रम करने के लिए तैयार नहीं है, वह कुछ नहीं कर सकता| सतत परिश्रम ही हमें आगे ले जा सकता है| सुस्ती पीछे ही धकेलती जाएगी| हम लोग अपने काम से बहुत जल्दी ही थक जाते हैं, परेशान होकर उसे छोड़ देते हैं, इस कारण हम उन्नति नहीं कर पाते| हमको धुन नहीं है, हममें लगन नहीं है| हम थोड़े से बहुत चाहते हैं, न मिलने पर रुष्ट हो जाते हैं| इस परिश्रम की कमी से हम अपना काम ठीक तरह नहीं करते|