निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लीखिए।
यह सभी जानते हैं कि आधुनिक विज्ञान और तकनीकी ने मनुष्य को बहुत कुछ दिया है। उसी की कृपा से संसार के मनुष्य एक-दूसरे के निकट आए हैं।अनेक पुराने संस्कार जो गलतफ़हमी पैदा करते थे, झड़ते जा रहे हैं। मनुष्य को नीरोग, दीर्घजीवी और सुसंस्कृत बनाने के अनगिनत साधन बढ़े हैं, फिर भी मनुष्य चिंतित है। जो अंधाधुंध प्रकृति के मूल्यवान भंडारों की लूट मचाकर आराम और संपन्नता प्राप्त कर रहे हैं, वे बहुत परेशान नहीं हैं। वे यथास्थिति भी बनाए रखना चाहते हैं और यदि संभव हो तो अपनी व्यक्तिगत, परिवारगत और जातिगत संपन्नता अधिक-से-अधिक बढ़ा लेने के लिए परिश्रम भी कर रहे हैं। ऐसे सुखी लोग 'मनुष्य का भविष्य' जैसी बातों के कारण परेशान नहीं हैं पर जो लोग अधिक संवेदनशील हैं और मनुष्य जाति को महानाश की ओर बढ़त देखकर विचलित हो उठते हैं, वे ही परेशान हैं। उनकी संख्या कम है। उसमें विवेक की मात्रा अधिक है और साधारण सुखी लोगों की तुलना में उनके भीतर दर्द है, व्याकुलता है और चिंता है। कबीर ने इन दो श्रेणियों के लोगों को समझा था। वे कह गए हैं- 'जो खाता और सोता है, वह ही सुखी है। केवल कबीर ही है जो दुखी है, जागता और रोता है।' यह 'जागना' सारी चिंता का मूल है। जागना अर्थात् विवेक के साथ सोचना । निस्संदेह, मनुष्य ने अपने आपके लिए 'महती विनष्टि' के साधन ढूँढ़ लिए हैं और यह बड़ी तेजी से महानाश की ओर दौड़ पड़ा है। यह भयंकर दु:संवाद है परंतु साथ ही मनुष्य की जिस बुद्धि ने यह सारा साज-सामान तैयार किया है, वह जाग भी रही है। मनुष्य के हृदय में पीड़ा है, तड़प है, यह आशा की बात है।