निर्देश: नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए :
मानव लक्ष्य को सफल बनाने में योग्य शिक्षा व व्यवस्था की अपेक्षा प्रत्येक व्यक्ति में किसी न किसी अंश में पाई जाती है जो चेतना विकास मूल्य शिक्षापूर्वक राज्यनीति एवं धर्मनीति से ही सफल है। दोनों के मूल में मानवीयता पूर्ण व्यवस्था है जिसमें अर्थ के सदुपयोग एवं सुरक्षा की अवधारणा समाई है। प्रेरक (नेतृत्व) के मूल में दर्शन एवं विचार क्षमता है, जो सफल होती है। प्रत्येक सुद्दढ़ विचार का आधार दर्शन है। अन्ततोगत्वा दर्शन-क्षमता ही नेतृत्व-क्षमता सिद्ध होती है। सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति रूपी अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान ही सम्पूर्ण ज्ञान है।
समाधानात्मक भौतिकवाद की चरितार्थता आवश्यकता से अधिक उत्पादन है, जो अर्थ के सदुपयोग एवं सुरक्षा के रूप में मानवीयता में दृष्टव्य है। यही मानव की चिर-कामना है, जिसका पालन पाँचों स्थितियों में, मानवीयता पूर्वक होता है। अमानवीयता में इसकी अवहेलना होती है, अतिमानवीयता पूर्वक स्वभावत: चरितार्थ होती है। चरितार्थता ही मानव का अभीष्ट है।
आशा, आवश्यकता तथा अनिवार्यता पूर्वक किया गया प्रयास ही अभीष्ट है, इससे विहीन कार्यकलाप मानव में सफल नहीं होता है। अस्तित्व में जागृतिपूर्वक मानव स्पष्टाधिकार सम्पन्न एवं क्षमता को स्पष्ट करता है, जो एकसूत्रता, सार्वभौमता है।
सामाजिक मूल्य अनुभव में, शिष्ट मूल्य व्यवहार में एवं भौतिक मूल्य उत्पादन उपयोगिता में स्पष्ट है। ‘‘सभी राज्य संस्थाएं अखण्ड समाज के अर्थ में है’’। परिवार भी अखण्ड समाज के अर्थ में प्राथमिक एक घटक है। इस स्थिति में मुख्यतः सहअस्तित्व प्रमाणित होता है। मानव में अनुभव बोध सम्पन्नता ही प्रबुद्धता है। यही शिक्षा व्यवस्था का आद्यान्त लक्ष्य है जो कारण, सूक्ष्म एवं स्थूल तत्वों का अध्ययन है। जिसमें ज्ञान, विवेक एवं विज्ञानपूर्वक अखण्ड समाज एवं सार्वभौम व्यवस्था प्रमाणित होती है।