Comprehension Passage
यह साधना कहाँ तक फलवती हुई है, इसकी कसौटी व्यवहार ही है। जीवन में अपमान, दुःख, कष्ट आने पर व्यक्ति क्या करता है, क्या वह रोने बैठ जाता है, क्या वह प्रतिशोध के लिए बावला हो उठता है, तब तो समझना चाहिए कि साधना कच्ची ही है। भाव- साधना तो व्यक्तिगत साधना है, किन्तु उसकी सुगंध साधक की क्रिया में आनी चाहिए। क्रिया सामाजिक होती है। साधना में कहाँ तक सिद्धि मिली है, इसकी कसौटी क्रिया ही है। यदि वह दूषित है तो साधना को भी दूषित समझना चाहिए। अपना प्रिय यदि थप्पड़ लगा दे तो उसके प्रेम पर विश्वास होने के कारण हम उसे क्रीड़ा समझते हैं। फिर प्रभु पर पूरा विश्वास हो और उनकी तरफ से आये आघात को कोई स्वीकार न करें तो बात नहीं बनती है।

पक्की साधना का लक्षण है -

1
अपमान का प्रतिकार करना 
2
कष्ट में बावला हो उठना
3
परिपक्व व्यवहार करना
4
दुःख आने पर रोना

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