निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
पत्र-साहित्य का महत्त्व इसलिए है कि उसमें पत्र-लेखक अपेक्षाकृत मुक्त होकर अपने को व्यक्त करता है। पत्रों को दो कोटि में बाँट सकते हैं। एक तो निजी पत्र, जो प्रकाशन के उद्देश्य से नहीं लिखे जाते और दूसरे ऐसे पत्र, जो पत्र होते हुए भी वास्तव में साहित्यिक कृति के रूप में लिखे तथा प्रकाशित किये जाते हैं। इनकी सुदृढ़ परंपरा की शुरुआत बालमुकुंद गुप्त द्वारा शिवशंभु के छद्म नाम से लिखे गये 'चिट्ठे' और 'भारत मित्र' में प्रकाशित पत्रों की लोकप्रियता से होती है। तत्कालीन वायसराय लार्ड कर्जन के नाम लिखे गये 'शिवशंभु के चिट्ठों' ने तो उस समय के पाठकों में तहलका मचा दिया था। इन चिट्ठों में देश के सर्वोच्च शासक, वायसराय की बड़ी तीव्र आलोचना की गयी थी। वैयक्तिकता पत्र-साहित्य की मूलभूत विशेषता है। पत्र, वस्तुस्थिति के सूचक, ज्ञातव्य के प्रकाशक और अभिप्रेत के वाहक भी होते हैं। महापुरुषों की प्रामाणिक जीवनियों के लेखन में भी उनके जीवन, युग और विचारों पर प्रकाश डालने में सहायक पत्रों को उद्धृत किया जाता है। पिछले तीस वर्षों में कुछ विशिष्ट साहित्यकारों के महत्त्वपूर्ण पत्र-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। इनमें चिट्ठी पत्री, दो खंड, (1962 ई.) सं. अमृतराय, (प्रेमचंद के पत्रों का संग्रह), फाइल और प्रोफाइल (1968 ई.) (साहित्यकारों के 'उग्र' के नाम पत्र) और निराला के पत्र (1971 ई.) सं. जानकी वल्लभ शास्त्री आदि पत्र-संग्रह महत्त्वपूर्ण हैं।