निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर प्रश्नों के लिए सही विकल्पों का चयन कीजिए :
'संस्कार' एक ऐसा शब्द है जिसका हम पोस्टमार्टम नहीं कर सकते। उसका रेशा-रेशा खोलकर नहीं दिखा सकते कि वह किन तत्वों से बना है। उसमें हमारी कितनी पुश्तों का योगदान है। एक तरह से वह हमारे मानसिक डी.एन.ए. की तरह है। कितने युगों, साधनों, स्मृतियों, परंपराओं के रासायनिक मिश्रण का योगफल। हमने उसे कब और कैसे पाया, उसमें से कितना अर्जित किया, कितना पुरखों के अनुग्रह से मिला, इसे जानना भी आसान नहीं। हमारे लिए यह जानना ज़्यादा आसान है कि अंततः वही चीज़ें बचती हैं जो प्राणवान बनी रहें। सप्राण और निष्प्राण की पहचान हम चीज़ों के बढ़ने, पनपने की अंदरूनी ताकत से करते हैं। इस ताकत का होना या न होना ही विकसने-गिरने का कारक कारण है। बढ़ने की तरह चीजें घटती भी हैं। विकृत भी होती हैं। इस क्रिया की पहचान को महादेवी जी ने सुंदर व्याख्या की है। उनका कहना है, परिवर्तन हर चीज़ का नियम है। उसे तो हर हाल में होना ही है, पर परिवर्तन के दो रूप हैं - एक रूप है विकास, दूसरा रूप है विकृति। परिवर्तन दोनों दशाओं में होता है पर दोनों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। एक उन्नति का परिचायक है, दूसरा अवनति का। संस्कार को हम इसी तुला पर तौलते हैं- कौन-कौन सी चीजें, कौन-कौन से अनुभव, कौन से दृश्य, कौन-सी सूचनाएँ हमें या हमारे व्यक्तित्व को आगे ले जाती हैं, कौन-सी पीछे। किन चीज़ों का फलयोग हमारे जीवन में उत्कर्ष की तरह सामने आता है, किनका अपकर्ष की तरह। रास्तों के चुनाव और अपनी संवेदना के इस्तेमाल के लिए यह समझ कारगर सिद्ध हो सकती है।