Comprehension Passage

निर्देश: गद्याशं को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिये-

अनुभव हस्तान्तरण की प्रक्रिया में लेखक अपनी संवेदन ऊर्जा से परिचालित होता है। यह केवल अनुभव का हस्तान्तरण नहीं होता, एक पूरी जीवन दृष्टि का हस्तान्तरण होता है। एक पूरी सोच अनुभव सिक्त हो कर, तरह-तरह के भूमिगत प्रदेशों से प्रवाहित हो कर, एक मानसिकता का ठोस स्वरूप ग्रहण करती है। अपने संवाहन के साधनों को निरखती परखती है ताकि पाठक तक पहुंचने की यात्रा में कुछ दरक न जाए, कुछ पीछे न छूट जाए या फिर जो है वही न लग कर कुछ और ही लगने लगे। संवेदना और दृष्टि दो तरफ़ा आवाजाही है। दोनों एक दूसरे की जनक भी हैं और निर्देशक भी। हमारी संवेदनाएं और दृष्टि यथार्थ के स्वरूप को ठीक वैसा ही नहीं रहने देतीं। प्रतिक्रियाएं भी इसलिए भिन्न होती हैं। लेकिन स्थूल रूप में स्वीकृत बृहत सामाजिक यथार्थ का स्वरूप, जो एक समयांश की रचना है उसे पूरी तरह अस्वीकृत करने के लिए एक विशेष परिस्थिति की आवश्यकता होती है। उस विशेष परिस्थिति में एक दार्शनिक यथार्थ की रचना होती है, ऐसे दार्शनिक यथार्थ की जो अपनी अमूर्तता में ही सक्रिय होता है। एक सशक्त कलाकार के हाथों व्यक्त होकर वह एक विश्वसनीयता भी प्राप्त करता है। ऐसा ही दार्शनिक यथार्थ हमारे अपूर्व कलाकार चेख़व की कहानी 'शर्त' में व्यक्त हुआ है। एक मामूली सी सांसारिक परिस्थिति एकदम अस्वाभाविक बन उठती है। वास्तविकताएं फ़ैंटेसी का रूप धारण करती हैं और फ़ैंटेसी एक ऐसा मायावी यथार्थ रचती है जो हमारे आसपास के आभास को पूरी तरह निलम्बित करके एक दार्शनिक यथार्थ की रचना करती है। चेख़व की सशक्त कहानियां अनपढ़ी तो कम ही होंगी, लेकिन इस कहानी को एक बार से ज़्यादा पढ़ना ही अधिक स्वाभाविक है। इसकी कठिनाई की वजह से बिल्कुल नहीं, बल्कि इस के विपरीत आसानी से अपने अंधेरों में झांकने का अवसर देती हुई यह कहानी हर बार बहुत कुछ प्रकाशित कर जाती है। इन अन्धेरों को भी हम प्यार कर उठते हैं और उसके बाद होने वाले प्रकाश को भी अपनी बन्द आंखों पर महसूस होने देते हैं।

अनुभव से युक्त मानसिकता का ठोस स्वरूप कौन ग्रहण करता है?

1
संवेदनाएं
2
परिस्थिति
3
सोच
4
समाज

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