निम्नलिखित गद्यांश का ध्यानपूर्वक अध्ययन कर प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
व्यक्ति समाज की इकाई है और शिक्षा व्यक्ति को सत्, चित् और आनंद की अनुभूति करने योग्य बनाती हैं। शिक्षा का अर्थ है जीना सीखने की कला। हम जीते हैं समाज में अत: शिक्षा का मूल स्रोत है समाज। इस प्रकार शिक्षा और समाज का परस्पर घनिष्ठ संबंध है। शिक्षा व शिक्षण संस्थाओं का समाज में विशेष महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि यहीं से भावी नागरिक ढल कर निकलते हैं। आज समाज के मूलरूप को परिष्कृत करने हेतु नैतिक शिक्षा के प्रश्न का विशेष बल दिया जाने लगा है। यह आवश्यकता अनुभव की गई है कि हमारी मान्यताओं का स्खलन हो रहा है। सामाजिक जीवन में जो अनैतिकता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है उसका मूल कारण नैतिक शिक्षा का अभाव है। आज हमने भौतिक उन्नति को एकमात्र उद्देश्य बना दिया है हम भौतिकवादी से अतिभौतिकवादी होते जा रहे हैं और यही कारण है कि विफलताएं हमारे मार्ग को अवरुद्ध करती जा रही है। आज शिक्षा का महत्व केवल पुस्तकीय ज्ञान मात्र है जो पुस्तकों में ढलता जा रहा है। यह शैक्षिक प्रक्रिया केवल मशीनीकरण का पर्याय ना बने और व्यवहारिक सद्शिक्षा का स्वरूप विकसित हो इसके लिए अपेक्षित है कि नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी जाए अन्यथा समाज में अपराध प्रवृति निरंतर बढ़ती रहेगी। यदि हम जीवन में सामंजस्य स्थापित करना चाहते हैं तो भौतिक प्रगति के साथ-साथ आध्यात्मिक प्रगति को भी जागरूक बनाए रखना आवश्यक है। आज विद्यार्थियों में व्याप्त अनुशासनहीनता, निराशा एवं हतोत्साह के प्रमुख कारण मानसिक एवं आध्यात्मिक अनुशासन का अभाव है। अतएव विद्यार्थियों में प्रारंभ से ही चरित्र-निर्माण और देशभक्ति की भावना जागृत करने के लिए उनमें दृढ़ संस्कारों का निर्माण करने के लिए नैतिक शिक्षा देना अति आवश्यक है। नैतिक शिक्षा के बिना स्वस्थ समाज की कल्पना असंभव है।