निर्देश: नीचे दिये गये अपठित गद्यांश को पढ़िए और प्रश्न के उत्तर दीजिए।
कवि के सम्बन्ध में यह कथन अक्षरश: सत्य प्रतीत होता है कि कवि प्रकृति का पुरोहित होता है। जिस प्रकार पुरोहित अपने यजमान के समस्त कुलाचारों एवं रीति-परम्पराओं से अभिज्ञ होता है, उसी प्रकार कवि को प्रकृति के समस्त रहस्यों एवं क्रिया प्रक्रियाओं का मर्मज्ञ होना चाहिए। इसके बिना कवि को 'कवि' की संज्ञा से विभूषित करना भी उचित प्रतीत नहीं होता। कवि ही अपनी सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति द्वारा प्रकृति के प्रांगण में ऐसे तथ्यों एवं पदार्थों को देख लेता है, जहाँ सामान्य व्यक्तियों की दृष्टि नहीं जाती, और यदि जाती भी है तो तत्व तक नही पहुंचती। तह तक पहुँचे बिना कोई ऐसी बात नहीं निकलती, जो साधारण होने पर भी असाधाराण हो, लौकिक होने पर भी, अलौकिक आनन्दोत्पादक हो, सबकी देखी होने पर भी, नवीन चमत्कार दिखाने वाली हो, प्रकृति के गुप्त एवं मुक्त रहस्यों को सर्वसाधारण के दृष्टिपथ में लाना कवि का काम हैं। अज्ञेय की मीमांसा करते रहना, आकाश-कुसुमों की सृष्टि करना या आकाश के तारे तोड़ना कवि का काम नहीं है। यह दार्शनिक का काम है, कवि का काम इससे भी गहन है। व्याकरण एवं पिंगल के नियमानुसार वर्णों की नपी-तुली पद्य रचना का नाम भी कवित्व नहीं है, जैसा कि प्रायः समझा जाता है। सूक्ष्म दृष्टि से प्रकृति पर्यवेक्षण की असाधारण शक्ति के साथ-साथ कवि के पास जीवनानुभवों का अक्षय कोष होना चाहिए तथा उसे विविध कलाओं एवं शास्त्रों का भी ज्ञाता होना चाहिए।