निर्देशः निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए
परमहंस रामकृष्ण ने साधनापूर्वक धर्म की जो अनुभूतियाँ प्राप्त की थीं, स्वामी विवेकानंद ने उनसे व्यावहारिक सिद्धांत निकाले। देश में बौद्धिकता के साथ नास्तिकता का प्रचार बढ़ता जा रहा था, किंतु रामकृष्ण को इसकी भी चिंता नहीं थी। वस्तुतः संसार से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं था। वे आत्मानंद की खोज में थे एवं आनंद का सबसे सुगम मार्ग उन्हें यह दिखाई पड़ा था कि अपने आप को वे काली की कृपा के भरोसे छोड़ दें। उनका सारा जीवन प्रकृति के निश्छल पुत्र का जीवन था। वे अदृश्य सत्ता के हाथ में एक ऐसा यंत्र बन गए थे जिसमें कालिमा नहीं थी, मैल नहीं था, अतएव जिसके भीतर से अदृश्य अपनी लीला का चमत्कार अनायास दिख सकता था। बहुत दिनों से हिंदुओं का विश्वास रहा है कि हृदय के पूर्ण रूप से निर्मल हो जाने पर, मन से स्वार्थ की सारी गंध निकल जाने पर एवं चित्त में छल की छाया भी नहीं रहने पर मनुष्य की सहजवृत्ति पूर्ण रूप से जाग्रत हो जाती है। तब धर्म की अनुभूतियाँ उसके भीतर, अपने आप जागने लगती हैं। रामकृष्ण के जीवन में यह सत्य साकार हो उठा था। अतएव, धर्म की सारी उपलब्धियाँ उन्हें अपने आप प्राप्त हो गईं। उन उपलब्धियों के प्रकाश में विवेकानंद ने भारत और समग्र विश्व की समस्याओं पर विचार किया एवं उनके जो समाधान उन्होंने प्रस्तुत किए, वे असल में, रामकृष्ण के ही दिए हुए समाधान हैं। रामकृष्ण और विवेकानंद एक ही जीवन के दो अंश, एक ही सत्य के दो पक्ष हैं। रामकृष्ण अनुभूति थे, विवेकानंद उनकी व्याख्या बनकर आए। रामकृष्ण दर्शन थे, विवेकानंद ने उनके दर्शन के क्रिया पक्ष का आख्यान किया।