इस समय हमारे देश की सबसे विकराल समस्या है - जनसंख्या में अंधाधुंध वृद्धि। इस समस्या के कारण भारतीयों का जीवन नारकीय बन गया है। जनसंख्या वृद्धि ने इन समस्याओं को जन्म दिया है - गरीबी, अशिक्षा, रोग वृद्धि, आवास एवं बेरोजगारी की समस्या। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि एक बच्चा जो मुँह लेकर पैदा होता है वह दो हाथ लेकर भी पैदा होता है। उनके इस कथन का आशय यह था कि दो हाथों से मेहनत करने वाला व्यक्ति अपना पेट तो भर ही सकता है। भारत की भूमि का क्षेत्रफल विश्व की कुल धरती का 2.4% ही है, जबकि यहां की जनसंख्या विश्व की कुल जनसंख्या का पांचवाँ भाग है। यह एक बड़ा असंतुलन है। हरे-भरे जंगलों को इसलिए काटा जा रहा है क्योंकि जनसंख्या बढ़ने के परिणामस्वरूप कृषि और आवास के लिए भुमि का अभाव होता चला जा रहा है। इसके फलस्वरूप प्रदूषण बढ़ रहा है तथा वन-संपदा का नाश हो रहा है। अमूल्य वनस्पतियाँ और दुर्लभ जंगली जानवर लुप्त होते जा रहे हैं। शहरी जीवन इसलिए नारकीय बनता चला जा रहा है क्योंकि ग्रामवासी गाँव को छोड़ कर आ रहे हैं। नाना प्रकार के रोग बढ़ रहे हैं। भारत में इस समय लगभग दो करोड़ बांग्लादेशी शरणार्थी हैं। इनमें से अधिकांश लोग तस्करी और नशीले पदार्थों का धंधा करते हैं। चीन ने अपनी जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए एक दंपत्ति एक ही बच्चा का लक्ष्य रखा है तथा इसे कठोरतापूर्वक लागू किया जा रहा है। इससे उनकी जनसंख्या वृद्धि की दर 3.2% से घटकर 1.4% रह गई है। जनसंख्या नियंत्रण में न्यायपालिका, संसद, कार्यपालिका पत्रकारिता और एन.जी.ओ की भूमिका प्रभावी हो सकती है।