Comprehension Passage
भाषा के माध्यम से मनुष्य अपने भावों और विचारों को एक दूसरे पर प्रकट करता है। परन्तु प्रश्न यह उठता है कि क्या विचार-विनिमय के सभी साधन भाषा कहला सकते हैं। सामान्य रूप से वह कोई भी माध्यम 'भाषा' कहा जा सकता है जिसके द्वारा एक मानव अपने विचार दूसरे तक पहुँचा सके, यथा -बोलना, चुटकी बजाना आदि। पर भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से संकेतों को भाषा नहीं कहा जा सकता। भाषा की परिभाषा देते हुए स्वीट ने कहा है -"ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है।" गुणे ने इस परिभाषा को संशोधित रूप में प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार, "ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा ह्रदयगत भावों तथा विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है।" वेंद्रेज के अनुसार, 'भाषा एक प्रकार का चिह्न है। चिह्न से आशय उन प्रतीकों से है जिनके द्वारा मानव अपने विचार दूसरों पर प्रकट करता है।" इस दृष्टि से श्रेष्ठ परिभाषा मेरिओ पाई की मानी जा सकती है जिन्होंने 'ग्लॉसरी ऑफ लिंग्विस्टिक टर्मिनोलॉजी' में लिखा है, ''भाषा किसी मानवीय जाति अथवा समाज विशेष के सदस्य के बीच यादृच्छिक व परम्परागत वाचिक प्रतीकों का प्रयोग कर उच्चारण तथा श्रवण अवयवों द्वारा परिचालित सम्प्रेषण की व्यवस्था है।" इस परिभाषा से भाषा के लिए आवश्यक सभी तत्त्व हमारे सम्मुख स्पष्ट हो जाते हैं। जैसे-भाषा मानव जाति से ही सम्बंधित है। पशु-पक्षी भी किसी-न-किसी प्रकार से अपने भाव अन्य पशु-पक्षियों तक पहुँचा सकतें हैं पर वह भाषा नहीं है। इसी प्रकार से भाषा समाज विशेष के सदस्यों के बीच काम करती है। एक भाषा का अपना निश्चित समाज होता है। उस समाज के बाहर उस भाषा का कोई अर्थ नहीं होता। भिन्न समाज के व्यक्तियों के बीच वे ध्वनियाँ निरर्थक ही होती हैं।
ग्लॉसरी ऑफ लिंग्विस्टिक टर्मिनोलॉजी' के लेखक है-
1
स्वीट
2
गुणे
3
मेरिओ पाई
4
वेंद्रेवेंद्रेज