बाल्यकाल से ही यदि भाषा - शिक्षा के साथ भाव - शिक्षा की भी व्यवस्था हो और भाव के साथ समस्त जीवन - यात्रा नियमित हो, तभी हमारे जीवन में यथार्थ सामंजस्य स्थापित हो सकता है। हमारा व्यवहार तभी सहज मानवीय व्यवहार हो सकता है और प्रत्येक विषय में उचित परिमाण की रक्षा हो सकती है । हमें यह अच्छी तरह समझना चाहिए कि जिस भाव से हम जीवन निर्वाह करते हैं उसके अनुकूल हमारी शिक्षा नहीं है। जिस घर में हमें सदा के लिए रहना है उसका
उन्नत चित्र हमारी पाठ्यपुस्तकों में नहीं है। जिस समाज के बीच हमें अपना जीवन बिताना है उस समाज का कोई उच्च आदर्श हमें शिक्षा प्रणाली में नहीं मिलता। उसमें हम अपने माता-पिता, सुहृद - मित्र, भाई - बहन किसी का प्रत्यक्ष चित्रण नहीं देखते । हमारे दैनिक जीवन के कार्यकलाप को उस साहित्य में स्थान नहीं मिलता। हमारे आकाश और पृथ्वी, निर्मल प्रभात और सुंदर संध्या, परिपूर्ण खेत और देशलक्ष्मी स्रोतस्विनी का संगीत उस साहित्य में ध्वनित नहीं होता । यह सब देखकर हम समझ सकते हैं कि वर्तमान शिक्षा के साथ हमारे जीवन का निबिड़ मिलन होने की कोई संभावना नहीं है। दोनों के बीच एक व्यवधान है। हमारी शिक्षा जीवन की आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं कर पाती। जहाँ हमारे जीवन-वृक्ष की जड़ें हैं वहाँ से सौ गज दूर हमारी शिक्षा की वर्षा होती है। जो थोड़ा-बहुत पानी हम तक पहुँचता है वह जीवन की शुष्कता दूर करने के लिए यथेष्ट नहीं है। जिस शिक्षा को लेकर हम जीवन व्यतीत करते हैं उसकी उपयुक्तता किसी एक व्यवसाय तक ही सीमित रहती है। जिस संदूक में हम अपने दफ्तर की पोशाक रखते हैं उसी के अंदर अपनी विद्या को भी बंद कर देते हैं। संपूर्ण जीवन के साथ उसका कोई संबंध नहीं होता। यह वर्तमान शिक्षा प्रणाली का स्वाभाविक परिणाम है और इसके लिए छात्रों को दोष देना अन्याय होगा। उनका ग्रंथ-जगत् एक ओर है तो वास्तव्य - जगत् दूसरी ओर। इन दोनों के बीच केवल व्याकरण-शब्दकोश का सेतु है। इसलिए हमें इस बात से आश्चर्य नहीं होता कि एक ही व्यक्ति एक ओर योरोपीय दर्शन, विज्ञान और न्यायशास्त्र का पंडित है तो दूसरी ओर सारे कुसंस्कारों का यत्नपूर्वक पोषण भी करता है; एक ओर स्वाधीनता के उज्ज्वल आदर्श का प्रचार करता है तो दूसरी ओर पराधीनता के शतसहस्त्र तंतुपाश से अपने को और दूसरों को प्रतिक्षण आच्छन्न भी करता है। विद्या और व्यवहार के बीच एक दुर्भेद्य व्यवधान उत्पन्न हो गया है; दोनों में सुसंलग्नता निर्मित नहीं हो पाती।