Comprehension Passage
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सही / सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए ।
निंदा का उद्गम ही हीनता और कमज़ोरी से होता है। मनुष्य अपनी हीनता से दबता है । वह दूसरों की निंदा करके ऐसा अनुभव करता है कि वे सब निकृष्ट हैं और वह उनसे अच्छा है । उसके अहं की इससे तुष्टि होती है। बड़ी लकीर को मिटाकर, छोटी लकीर बड़ी बनती है । ज्यों-ज्यों कर्म क्षीण होता जाता है, त्यों-त्यों निंदा की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। कठिन कर्म ईर्ष्या-द्वेष और इनसे उत्पन्न निंदा को मारता है । कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हममें जो करने की क्षमता नहीं होती, वह यदि कोई करता है तो हमारे पिलपिले अहं को धक्का लगता है । तब हम उस व्यक्ति की निंदा करके उससे अपने को अच्छा समझकर तुष्ट होते हैं ।
'निंदा' का अर्थ है
1
बुराई
2
भलाई
3
प्रशंसा
4
निद्रा