निम्नलिखित अनुच्छेद को पढ़कर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
आजकल पढे-लिखे नवयुवकों को विदेशी संस्कृति और जीवन अपनी ओर सर्वाधिक आकर्षित कर रहे है। इसके लिए कई माता-पिता का भी सपना होता है कि उसकी संतान विदेशों में पढ़ने जाए, वहाँ की सुख-चैन की जिन्दगी बसर करे और समाज में उनका नाम ऊँचा हो। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। भारत में बेकारी है, गरीबी है, गन्दगी है, प्रदूषण है, भ्रष्टाचार है, लूट-पाट है और विदेशों में इसमे सर्वथा विपरीत स्वर्गीय आनंद है। माँ-बाप के अथक प्रयासों एवं प्रेरणा के फलस्वरूप बच्चे विदेशों में पढ़ने-बसने चले जाते है। शुरू में तो माँ-बाप, सगे-सम्बन्धी सभी याद आते हैं पर कालांतर में बच्चे वहाँ की जिन्दगी और वहाँ की तथाकथित सभ्यता में इतने रच-बस जाते हैं कि धीरे-धीरे वे पड़ोसियों, सगे-सम्बन्धियों, अपने भारतीय मित्रों और मां-बाप को भी भूलने लगते हैं। पहले वर्ष में एक-दो बार इसके बाद क्रमशः धीरे-धीरे भारत में आना कम होने लगता है। अगर विदेशी मैम से शादी हो जाए तो कहने ही क्या? कुछेक को छोड़कर ज्यादातर के ये ही हाल हैं। इसमें उन बच्चों का उतना दोष भी नहीं है और न विदेश भेजने वाले अभिभावक ही कदाचित उतने दोषी हैं। शायद उनके संस्कारों में ही कोई कमी रह गई हो। पीढ़ियों के अंतराल के प्रभाव की समझ न रखने वाले ज्यादातर माँ-बाप दो-चार महीने तक संतान के पास जाकर इसके बाद वापस स्वदेश आ जाते है क्योंकि उनके कमाऊ पूत स्वदेश में आकर बसना नही चाहते। बच्चों की शिकायत है कि माँ-बाप उनकी पत्नी और बच्चों के साथ एडजस्ट नहीं करते और अपनी पुराने जमाने की चीजों को यहाँ थोपना चाहते हैं। इस प्रकार के व्यवहार से वे हमारे साथ कैसे रह पाएँगे? अपने द्वारा भोगे जाने वाले कष्टों और दुश्चिन्ताओं की चर्चा वे माँ-बाप किसी से नहीं करते। उनके द्वारा लिए गए निर्णय पर जग हंसाई के डर के साथ रहने वाले वे बुढ़ापे के कष्टों और बीमारियों को अकेले ही झेलते बच्चों के वियोग में अनकही पीड़ाओं के साथ एक-एक करके दोनों अंततः इस दुनिया से विदा हो जाते हैं।