निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उसके आधार पर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
किसी मनुष्य के घर का कोई प्राणी बीमार है। वह वैद्यों के यहाँ से जब तक औषधि ला- लाकर रोगी को देता जाता है और इधर-उधर दौड़-धूप करता जाता है तब-तब उसके चित्त में जो संतोष रहता है - प्रत्येक नए उपचार के साथ जो आनंद का उन्मेष होता रहता है - यह उसे कदापि न प्राप्त होता, यदि वह रोता हुआ बैठा रहता। प्रयत्न की अवस्था में उसके जीवन का जितना अंश संतोष, आशा और उत्साह में बीता अप्रयत्न की दशा में उतना ही अंश केवल शोक और दुःख में बँटता। इसके अतिरिक्त रोगी के न अच्छे होने की दशा में भी वह आत्मग्लानि के उस कठोर दुःख से बचा रहेगा जो उसे जीवन भर यह सोच-सोचकर होता कि मैंने पूरा प्रयत्न नहीं किया।
कर्म में आनंद अनुभव करनेवालों ही का नाम कर्मण्य है। धर्म और उदारता के उच्च कर्मों के विधान में ही एक ऐसा दिव्य आनंद भरा रहता है कि कर्ता को वे कर्म ही फल-स्वरूप लगते हैं। अत्याचार का दमन और क्लेश का शमन करते हुए चित्त में जो उल्लास और तुष्टि होती है, वही लोकोपकारी कर्म-वीर का सच्चा सुख है। उसके लिए सुख तब तक के लिए रुका नहीं रहता जब तक कि फल प्राप्त न हो जाए; बल्कि उसी समय से थोड़ा-थोड़ा करके मिलने लगा है, जब से वह कर्म की ओर हाथ बढ़ाता है।