एक गद्यांश दिया गया है। गद्यांश के आधार पर पाँच प्रश्न दिए गए हैं। गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़ें तथा प्रत्येक प्रश्न में चार विकल्पों में से सही विकल्प चुने।
मानव-जीवन और उसके द्वारा गठित समाज संसार में सर्वोच्च है। इसी कारण साहित्य, कला, ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, धर्म आदि स्थूल या सूक्ष्म संसार में जो कुछ भी है, वह सब जीवन और मानव-समाज के लिए ही है, यह एक निर्विवाद मान्यता है। उससे ऊपर या बाहर कुछ भी नहीं। मानव एक सामाजिक प्राणी है। वह व्यक्ति या समूह के स्तर पर जो कुछ भी सोचता, विचारता और भावना के स्तर पर संजोया करता है, वही सब लिखित या लिपिबद्ध होकर साहित्य कहलाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि साहित्य वस्तुत: जीवन और समाज से भावसामग्री लेकर, अपने शरीर या स्वरूप का निर्माण कर फिर वह सब जीवन और समाज को ही अर्पित कर दिया करता है। लेन-देन की यह प्रक्रिया साहित्य और समाज के आपसी संबंधों को प्राय: स्पष्ट कर देती है। जब से मानव ने सोचना-विचारना, पढऩा-लिखना और अपने-आपको दूसरों पर प्रकट करना सीखा है, तभी से साहित्य-समाज में आदान-प्रदान की यह प्रक्रिया भी चल रही है और तब तक निरंतर चलती रहेगी, जब तक कि मनुष्यों में सोचने-विचारने आदि के ये गुण रहेंगे। इस दृष्टि से साहित्य और समाज का संबंध चिरंतन कहा जा सकता है। मानव सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है और साहित्य उसकी महानतम उपलब्धि मानी गई है। उसमें उसका अपना ही भावाविल वैचारिक प्रतिबिंब संरक्षित रहा करता है। उसे पढ़-देखकर मानव-समाज अपने चेहरे पर लगे धब्बों का परिष्कार कर सकता है। इस प्रकार साहित्य और समाज में बिंब-प्रतिबिंब भाव या चोली-दामन का संबंध रेखांकित किया जा सकता है। मानव-समाज के लिए साहित्य हितकारी सिद्ध होता है।