नीचे दिए गए गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा पूछे गए प्रश्न के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प का चयन कीजिए।
एक बार हिन्दी दिवस पर मुख्य अतिथि को भाषण का मसौदा भेजा गया। अपनी व्यस्तता के कारण वे भाषण पहले पढ़ नहीं पाएं। कार्यक्रम के दौरान ही उन्होंने भाषण पर नजर डाली तो उसमें ऐसे-ऐसे शब्द लिखे थे जिनको पढना और उच्चारण करना बहुत कठिन था। वे विभागाध्यक्ष पर बहुत गुस्साए और फुसफसाए कि यह क्या लिखा है, कौन पढेगा इसे यह तो अंग्रेजी से भी कठिन है। खैर उन्होने खुद से भाषण दिया जो बहुत सटीक और संदेश देने वाला था । अंत में उन्होंने कहा, 'विभाग वालों ने भी मुझे बड़ी मेहनत से कुछ लिख कर दिया है इसे मैं न पढते हुए ज्यों का त्यों प्रेस को देता हूं।' मैंने स्वयं तीस वर्ष तक 'हिंदी - हिन्दी' का खेल खेला है। बार बार हिन्दी की बैठकें आने पर एक पुस्तिका तैयार की गई थी जिसमें हिन्दी में जो जो हुआ उस का इतिहास क्रमबद्ध तरीके से लिखा गया। महापुरूषों की कुछ उक्तियां भी डाली गई। यह पुस्तिका हर बैठक में और हर कार्यक्रम में एक कुंजी की तरह काम आती थी। वैसे ही कार्यालयों में जो एक बार भाषण तैयार किया जाता है, अगले वर्ष उसी को फाइल से निकाल कर सन बदल करके आगे भेज दिया जाता है। जब किसी ' अंग्रेजी नोईंग' सचिव के पास हिन्दी में नोट ले जाओ तो वह कहता, 'यह क्या लिख दिया यार, अंग्रेजी में लिखा करो ताकि कुछ समझ में भी आए। कौन पढ़ेगा इसे तुम्हीं पढ कर सुनाओ... अच्छा लाओ, कुछ उलटा सीधा तो नहीं लिखा है ना साईन कर देता हूं। 'इतना विश्वास तो रहता ही था अधिकारियों पर कि हिन्दी में चाहे जो लिखा है पर ठीक ही लिखा होगा। भारत सरकार के स्तर पर यूं तो कई शब्दावलियां निकाली गई हैं। राजभाषा आयोग, विधि आयोग, वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग आदि द्वारा शब्दकोष पर शब्दकोष निकाले गए, किन्तु पूरे देश में शब्दों का मानकीकरण अभी तक नहीं हुआ है। 'राज्य' को मध्यप्रदेश में 'शासन' कहा जाता है। 'लोक निर्माण विभाग को कहीं ' सार्वजनिक निर्माण विभाग कहा जाता है, फाइल को कहीं मिसिल, कहीं नस्ति कहा जाता है। सिविल अस्पताल को कहीं असैनिक, कहीं नागरिक अस्पताल लिखा जाता है। यानि यह शब्दावली राज्य दर राज्य तो भिन्न है ही, एक प्रदेश में भी कई रूपांतर प्रचलित हैं। सर्किट हाउस को कहीं विश्राम गृह, कहीं परिधि गृह लिखा जाता है। हिन्दी के प्रचार के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि उर्दू-फारसी, अंग्रेजी तथा स्थानीय भाषाओं के शब्दों को ज्यों का त्यों अपना लिया जाए और सरल से सरल आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया जाए कुरता, पाजामा दरवाजा, खिडकी, कलम, दवात, स्कूल, अस्पताल, इंस्पेक्टर, बोर्ड, वारंट, डिग्री आदि ऐसे शब्द हैं जो आज एक ग्रामीण भी बोलता और समझता है। प्रचलन प्रयोग से फैलता है। आरम्भ में सचिवालय, मन्त्रालय, अभियन्ता, टंकक, अनुभाग, प्रशासन, आबंटन, अधीक्षक, निरीक्षक, सर्वेक्षक, परिचर, नियन्त्रक आदि शब्द अजीब लगते थे।