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रामचंद्र शुक्ल जी के परिवार, पड़ोस, स्कूल, गुरु-वृन्द, मित्र-मंडली और अग्रज साहित्यकारों ने ही उन्हें साहित्य - पथ का दृष्टि संपन्न अन्वेषी बनाया। रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखित 'हिंदी साहित्य का इतिहास' को सबसे ज्यादा प्रामाणिक और व्यवस्थित इतिहास माना जाता है। शुक्ल जी के अग्रज साहित्यकारों में निर्माता - व्यक्तित्व के धनी थें - पं. केदारनाथ पाठक। इन्हीं के निर्देशन का अनुसरण करते हुए शुक्लजी चौधरी बद्रीनारायण उपाध्याय 'प्रेमघन' के साहित्य - दरवार तक पहुंचे थे। इन्हीं पाठक जी ने इन्हें रामप्रसन्न घोष और बंग महिला से भी परिचित कराया था। इन नए - नए परिचयों ने शुक्लजी को बांग्ला भाषा और साहित्य के प्रति आकृष्ट किया।
बंग महिला के पिता रामप्रसन्न घोष द्वारा स्थापित मेयो मेमोरियल लाइब्रेरी शुक्लजी के भाषाई और साहित्यिक अध्ययन की सांध्यकालीन - कक्षा बनी। यहीं बैठकर उन्होंने अंग्रेजी तथा बांग्ला भाषा - साहित्य का गहन अध्ययन किया। इसी दरम्यान घोष की पुत्री राजेन्द्रबाला घोष से रप्त - जप्त बढ़ा। फिर क्या था केदारनाथ पाठक, बंग महिला और रणचंद्र शुक्ल का लेखकीय त्रिकोण बना जो शुक्लजी के लिए अत्यंत उत्पादक सिद्ध हुआ। शुक्ल जी की रचनाओं में गवेषणात्मक, आलोचनात्मक और भावात्मक शैली की विशेषताएं देखने को मिलती हैं। अपनी रचनाओं में उन्होंने सूक्तियों का भी उपयोग किया है। जैसे - बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है।
यह सच है कि शुक्लजी में जन्मजात रचनात्मक प्रतिभा थी, परन्तु उन्हें हिंदी - साहित्य का सूत्रकार बनाने का माहौल सृजित किया उनके मिर्जापुरी परिवार तथा पड़ोस ने। हालाँकि रामचंद्र शुक्ल का जन्म बस्ती जिला के अगोना गाँव में शरद पूर्णिमा के मध्यान सन 1884 में हुआ था, परन्तु पारिवारिक सुख - दुःख की अनुभूति उन्हें मिर्जापुर में ही हुई।
वे चार वर्ष की अवस्था तक अगोना में रहे। सन 1888 में इनके पिता पं. चन्द्रबली शुक्ल हमीरपुर की राठ तहसील में सुपरवाइजर हो गए। वे अपने साथ ही अपना परिवार भी लेते गए। उस समय आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती का आर्यभाषा आंदोलन जोरो पर था। इसी बीच आठ वर्ष के बालक रामचंद्र शुक्ल को अंदर से बाहर तक झकझोर देनेवाली ऐसी दुखद घटना घटी जिसने उसके जीवन का रास्ता ही बदल दिया। यह दुखद घटना थी उनकी माता का देहांत। मातृ - स्नेह की मधुमयी धारा से वंचित होने वाले रामचंद्र शुक्ल अवसन्न हो गए। इसके बाद रामचंद्र शुक्ल को एक दशक तक पारिवारिक विग्रह का जहर पीना पड़ा, सही अर्थों में 'चन्दन विष व्यापै नहीं, लिपटे रहत भुजंग' का कथन चरितार्थ हुआ।