दिये गए गध्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़ें और दिये गए प्रश्नों का उत्तर दीजिये।
बिहारी का समस्त सृजन दरबारी काव्य परंपरा की रूचियों को ध्यान में रखकर सामने आया। रीतिवादी परिवेश पर सामंत कुमारों की धाक और धमक थी और कवि इन्हीं सामंत कुमारों के मनोविनोद के लिए राज्याश्रय पाकर गाते थे। राज्याश्रय पोषण के सभी तत्त्व रीतिकाल के काव्य में समाहित होते गए और काव्य चमत्कारवाद, नायक-नायिका भेद अलंकार प्रदर्शन का कृत्रिम क्षेत्र ही बनता गया। इस समाज और काव्य के मूल्यादर्शों की पूर्णता भोगवाद, नारी के सौंदर्य और शारीरिक वासना की तृप्ति में हुई। नारी के चारों ओर अलंकार, नायिका-भेद, प्रकृति वर्णन आदि चक्कर काट उठे। फलतः इनका प्रिय काव्य विषय बना नारी का नखशिख वर्णन, हाव-हेला वर्णन, अभिसारिका की विभिन्न अवस्थाओं और दशाओं का चित्रण I राजाश्रय और चमत्कार प्रदर्शन की होड़ में श्लेष, यमक, अन्योक्ति और अनुप्रास अलंकारों की बाढ़ आ गई और कृत्रिम कार्य व्यापारों से काव्य का सहज सौंदर्य नष्ट हो गया। कविवर बिहारी लाल का व्यक्तित्व काव्य मर्मज्ञ, शास्त्र ज्ञाता, बहुज्ञ मानव और रसिक व्यक्ति के आदर्श पर निर्मित हुआ था। बिहारी की एक ही रचना 'सतसैया' या 'सतसई' नाम से मिलती है। इसमें बिहारी के 713 मुक्तक दोहे तथा सोरठे संगृहित हैं। श्रृंगार, नीति और भक्ति के दोहों से युक्त इनकी 'सतसई' भाषा की समस्त शक्ति एवं अर्थ के पैनेपन को समेटे है। बिहारी के दोहे अर्थ गूढ़ होने के कारण 'गागर में सागर' भरने की कहावत चरितार्थ करते हैं। सतसई की पहली टीका 1662 में कृष्ण लाल ने की है। दूसरी टीका 1763 में मानसिंह ने और तीसरी 1714 में अनवर ने 'अनवर चंद्रिका' नाम से की है।