यद्यपि आज हम मना रहे हैं प्यारे हरिश्चंद्र की जन्मशती पर क्या यह सच नहीं है कि आज केवल उनकी कहानी भर रह गई है? क्या यह सच नहीं कि हिंदी और हिंदी कविता भारतेंदु और उनकी स्वस्थ परम्पराओं से कोसों दूर हो गई है? क्या भारतेंदु के बोए हुए बीज कुछ तो छायावादी हिमानी में गल पच नहीं गए और कुछ प्रगतिवादी आँच पाकर एक दम भुन नहीं गए हैं? चारों ओर लोग अवसाद में डूब उतरा रहे हैं और हिंदी के विकास के लिए अंधे होकर मार्ग टटोल रहे हैं, पर यह नहीं देखते हैं कि ज्योति नहीं है, प्राण नहीं है, भाषा और साहित्य में भारतेंदु युग की जीवनी शक्ति नहीं है, भाषा बनाव-सिंगार से बचते-बचते सादगी के अधिकाधिक मोह में कृत्रिम होती जा रही है। साहित्य अंतर्मुख होने के प्रयत्न में जटिल और लोक-अग्राह्य होता जा रहा है। उदारता का दावा हम आज चाहे जितना कर लें, परंतु हम अपने रंगीन चश्मे से केवल अपनी नाक की सीध देख पाते हैं,सौ भी अपने असली रंग में नहीं। इन सब के मूल में क्या है? यही हरिश्चंद्र की और उनके हाथ से रोपे हए पौधों की करुण कहानी।
सुनिएगा? हरिश्चंद्र ने भाषा और साहित्य को अलग करके देखा, और एक भाषा के लिए लड़ाई लड़ते हुए भी उन्होंने संपर्क में आने वाले सभी साहित्यों के खुले खजाने में जाकर लूट मचाने का न केवल उपदेश दिया बल्कि वे स्वयं इस डकैती में अगुवा बने। संस्कृत, बँगला, उर्दू, गुजराती और मराठी किसी को छोड़ा नहीं। सब साहित्यों से लिया और सबको अपनी भेंट भी दी। उनके साथी भी इस उदार दृष्टि को लेकर आगे बढ़े पर हाय रे दुर्दैव, धीरे-धीरे हिंदी और हिंदी साहित्य को इस प्रकार यारों ने एक खूंटे में बाँधा कि हिंदी साहित्य सँकरी गली बन कर रह गया। चोरी तो लोग करते रहे, पर डकैती, वह भी खुली डकैती का साहस और आत्म-बल किसी में आगे आया नहीं। इसलिए हिंदी साहित्य में मिलने वाले विभिन्न स्रोतों के मार्ग रुक गए और वह खारी झील बनकर रह गया। लोग कहेंगे हरिश्चंद्र और हरिश्चंद्र मंडल तो प्रेम और विरह की डेंगी पर छिछली खेलता रहा, जीवन की गहराई में पैठने का उसने यत्न तक नहीं किया; हाँ, वे डूबे तो फिर ऊपर आने के लिए, नीचे बैठ जाने के लिए नहीं। उन्हें जीवन के व्यापक क्षेत्रों में स्वच्छंद विहार करना था, गले में पाथर बाँधकर डूब नहीं मरना था। साथ ही उनमें दंभ न था, सीधा सच्चा हृदय का भाव था, शहर के अंदेशे से दुबला रहने वाला काजीपन उनमे नहीं था, वे देश की दुर्दशा में विकल होते तो अतीत की एक-एक स्मृति उन्हें दंश मारने लगती थी, भारत-भूमि का एक-एक कण उनके कानों में विलख उठता था। जब जनजीवन के उत्सव आते तो अपना सुख-दुख उसी के राग में डुबो देते थे।
उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्न का उत्तर बताइए।