निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गये प्रश्नों के सर्वाधिक उचित उत्तर वाले विकल्प का चयन कीजिए।
यदि आज भारतीय मनीषा इतिहास और अतीत के दो मृत खंडों में विभाजित दिखाई देती है तो हमें इसका कारण सीधा पश्चिम के उस अहं केन्द्रित इतिहास - बोध में दिखाई देगा जिसके पिछले दो सौ वर्षों में भारतीय मनुष्य को उसके अतीत और परंपरा से उन्मूलित किया है, कितना बड़ा व्यंग्य है कि जिन यूरोपीय इतिहासकारों और पुरातत्त्व के पंडितों ने अपने अनुवादों, खोजों और खुदाइयों से भारतवासी को अपनी विशिष्ट परंपरा से परिचित कराया उसी सभ्यता ने उस सामाजिक संरचना के तन्तु - जाल को भी नष्ट किया, जिसमें मनुष्य अपनी परंपरा में साँस लेता था, अपने पावन अतीत को अपने वर्तमान में जीता था। किसी जाति के मिथक और विश्वास उनकी जीवन प्रणाली उसके आत्मीय संसार से जुड़कर ही जीवंत हो पाते हैं, एक की अभिव्यक्ति दूसरे के द्वारा होती है। मनुष्य जीने की प्रक्रिया में अपने विश्वासों को उद्घाटित करता है, उन विश्वासों के द्वारा जीने की प्रणाली मर्यादित करता है, ऐसी संस्कृति में इतिहास का समय एक अक्षुण्ण धागे से परम्परा के कालातीत बोध से जुड़ा होता है। मनुष्य एक साथ दो काल - प्रदेशों में जीता है और ये दोनों एक - दूसरे से अलग नहीं हैं, से एक - दूसरे के समानान्तर भी नहीं हैं दोनों एक - दूसरे से उलझे हैं, इस उलझाव में ही एक जाति की आत्मा अपना आकार ग्रहण करती है। पश्चिम के इतिहास - बोध ने इस 'आत्मा' के तन्तु - जाल को छिन्न - भिन्न कर दिया, उसे दो फाँकों में खंडित कर दिया। मनुष्य का मिथक संसार और उसकी जीवन प्रणाली दो मृत कटघरों में विभाजित हो गए। नायपाल ने भारतीय संस्कृति को 'घायल संस्कृति' माना है।