‘अजौं तर्यौना हीं रह्यौ श्रुति सेवत इक-रंग।
नाक-बास बेसरी लह्यौ बसि मुकुतनु कैं संग।।’
उक्त दोहे में कवि का अभिप्रेत अर्थ है-1
भारतीय आभूषणों का परिचय देना
2
स्वर्ग-प्राप्ति की कामना
3
नायिका-सौंदर्य का चित्रण
4
सत्संग का महत्त्व बताना
5
अनुत्तरित प्रश्न