दिए गए गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प का चयन कीजिए।
कच्चे को पक्का आग ही तो करती है। यदि हमें अपने को पक्का करना है तो फिर अग्नि परीक्षा से गुज़रना ही होगा। कंचन को भी कुंदन की संज्ञा पाने के लिए अग्नि परीक्षा देनी ही पड़ती है। जिस तत्व को कच्चे से पक्के की यात्रा करनी है, उसे आग का योग करना ही पड़ेगा। फिर वह चाहे मिट्टी हो या भोजन। इतना ही क्यों जिस मन की आग बुझ जाए, जिसके हृदय में किसे काम के प्रति आग ही न हो फिर वह संसार की चुनौतियों को कितना स्वीकार कर सकेगा। यह विचारणीय है। आग का सामना करना चाहिए। उसे अपने दृष्टि पथ से ओझल नहीं होने देना चाहिए। यदि किसी कारणवश आग अनियंत्रित भी होती है तो उसे पीठ दिखाने से काम नहीं चलेगा। अच्छा तो यह होगा कि हम आग पर नियंत्रण रखें, क्योंकि किसी भी शक्ति का अनियंत्रित विस्तार अंतत: कष्ट का ही कारण बनता है। आज देश और समाज भिन्न-भिन्न आगों में दहक और सुलग रहे हैं तब आग की शक्ति और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। शक्ति को नियंत्रण में रखते हुए उसे लोक-कल्याणकारी स्वरूप दें। यही सदा से मानव मेधा और मन का काम्य रहा है। इसी की आराधना और साधना मनुष्य ने समूची यात्रा में की है।