जो लोग स्वार्थ वश व्यर्थ की प्रशंसा और खुशामद करके वाणी का दुरूपयोग करते हैं, वे सरस्वती का गला घोटते हैं। ऐसी तुच्छ वृत्ति वालों को कविता नहीं करनी चाहिए। कविता उच्चाशय, उदार एवं निःस्वार्थ हृदय की उपज है।
सत्कवि मनुष्य मात्र के हृदय में सौंदर्य के प्रवाह बहाने वाला है। उसकी दृष्टि में राजा और रंक सब सामान हैं। वह उन्हें मनुष्य के सिवा कुछ नहीं समझता।
प्रश्न: उपर्युक्त गद्यांश का शीर्षक दीजिये?
1
कवि का दुरुपयोग
2
कविता का दुरुपयोग
3
कविता का सदुरपयोग
4
गद्य का दुरुपयोग