Comprehension Passage

निर्देश: सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी, 

मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है

दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, 

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता?हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही, 

जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली, 

जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे 

तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।

 "सिंहासन खाली करो जनता आती है" पंक्ति का भाव सौंदर्य क्या है?

1
हर्ष
2
क्रोध
3
उत्साह
4
करुणा
5
अनुत्तरित प्रश्न

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