निम्न गद्यांश का अध्ययन कीजिए तथा दिए गए प्रश्नों के उत्तर का सही विकल्प चुनिए-
राजस्थान को छोड़कर विश्व में शायद ही कोई ऐसा राज्य हो जहाँ मृत्यु को पर्व की तरह मनाया गया हो। राजस्थानी योद्धाओं ने अपने त्याग और बलिदान द्वारा मृत्यु को गौरवान्वित किया है। कवि के शब्दों में-
"मरणा नूँ मंगल गिणै समर चढ़ै जद नूर"
अर्थात् मृत्यु को जब मंगल के रूप में ग्रहण किया जाता है, तभी युद्ध में नूर चढ़ता है; किन्तु मृत्यु को मंगल रूप में तभी ग्रहण किया जा सकता है जब योद्धाओं के सम्बल प्राणों से भी प्रिय कोई महान आदर्श रहा हो। निश्चय ही देश और धर्मरक्षा तथा मृत्यु का आलिंगन कर इतिहास में अमर हो जाने की भावना ने राजस्थान के योद्धाओं को बलवती प्रेरणा प्रदान की है।
कल्ला नामक एक वीर के लिए प्रसिद्ध है कि वह शाही सेना से लोहा लेकर देश की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति देना चाहता था। कविक्षेष्ठ राठौड़ पृथ्वीराज से यह बीकानेर में मिला और अपना विचार उसके सामने रखा। यह भी प्रार्थना की कि आप कवि हैं, वीरों को काव्य द्वारा अमर बनाने वाले हैं। मैं सिवाणा के किले में बैठकर शाही सेना से लोहा लूँगा और अन्त में वीरता के साथ लड़ता हुआ प्राणोत्सर्ग कर दूँगा। मैं चाहता हैं कि अपना मृत्यु-गीत मैं जीवित ही सुन पाऊँ। इस पर कवि ने उत्तर दिया, " कल्ला ! मैं कोई भविष्य-वक्ता तो हूँ नहीं कैसे जानूँगा कि तुम अमुक प्रकार से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त करोगे? हाँ, तुम्हारी मृत्यु के बाद तुम्हारे पराक्रम की कथा सुनाकर मैं तुम्हें अमर बनाने का प्रयत्न करूंगा।" कल्ला कब मानने वाला था। उसने प्रार्थना की कि मुझे अपना वीर-यश सुनने का बड़ा चाव है। आप जैसा वर्णन करेंगे, वैसा ही शानदार युद्ध मैं करूँगा। सर्वोत्कृष्ट वीरगति प्राप्त करने के लिए मैं तलवार बजाऊँगा, आप नि:संकोच होकर आज ही मेरा मृत्यु-गीत मुझे सुनाएँ। इस पर महाकवि पृथ्वीराज ने यह इतिहास प्रसिद्ध गीत सुनाया जिसमें पूर्ववर्ती समस्त वीरों की वीरता और मृत्यु की तुलना कल्ला से की गई थी। इधर वीर कल्ला ने भी उस गीत की भावना को अक्षरशः सत्य कर दिखाया। युद्ध करते समय कल्ला ने अपने शत्रुओं से कहा था "जब तक मेरे कन्धे पर सिर है, कोई भी सिवाणा पर अधिकार नहीं कर सकता।"
इस प्रकार स्पष्ट है कि युद्ध में प्रोणोत्सर्ग द्वारा अमर हो जाने की भावना भी योद्धाओं के लिए बलवती प्रेरणा का काम करती थी। जब मनुष्य प्राणों को हथेली पर रखकर मृत्यु का आलिंगन करता है, तब वह अपने संकुचित अहं की सीमा का अतिक्रमण कर आत्म-विस्तार द्वारा मानवता के व्यापक क्षेत्र में प्रवेश करता है। मृत्यु के बाद वह एक सामान्य व्यक्ति न रहकर इतिहास का पात्र बन जाता है। कल्ला ने भी अपने बलिदान द्वारा अपने को इतिहास का पात्र सिद्ध कर दिखला दिया।