निर्देश: मैंने ‘अतिथि’ शब्द के समानांतर एक दूसरा शब्द गढ़ा है- असमय’। अतिथि का अर्थ है जिसकी तिथि न हो, अर्थात् आने का दिन निश्चय न किया हुआ हो, मतलब कि जो बिना पूर्व सूचना के अकस्मात् टपक पड़े। ठीक उसी तरह ‘असमय’ का अर्थ कीजिए कि जिसका समय न हो जब चाहे आ जाए और आने में ही नहीं जाने में भी ‘असमय’ हो। तात्पर्य की कब तक रहेगा, कब जाएगा इसका कोई ठिकाना नहीं। मैं अतिथियों से नहीं घबराता पर ‘असमय’ से ज़रूर काँपता हूँ, कारण कि मैं कामकाजी आदमी हूँ। इस युग में कौन कामकाजी नहीं है। जिसको देखिए वही अस्त-व्यस्तता के मारे परेशान है। आजकल बड़प्पन दिखाने के जो कई साधन हैं, उनमें एक यह कहना भी कि ‘क्या बताऊँ साहब, खाना खाने तक की फुरसत नहीं मिलती, नींद और चैन हराम है।’
बात बहुत गलत हो, ऐसा नहीं। जिसको देखिए, चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही हैं, नाक की सीध में दौड़ा जा रहा है। जिधर नज़र डालिए उधर ही भाग-दौड़। आदमी ने मशीनें इज़ाद की, आराम के लिए, मगर मकड़े की तरह वह उन मशीनों में उलझकर अपनी आज़ादी खो बैठा, अपनी आदमियत खो बैठा। बाल-बच्चों के बीच इत्मीनान से बैठने का, दिल बहलाने का समय नहीं मिलता।