Comprehension Passage

मानो, जनता है फूल जिसे अहसास नहीं,

अब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;

अथवा कोई दुधमुँही जिसे बहलाने के

जंतर-मंतर सीमित हों चार खिलौनों में।

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,

जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढ़ाती है;

दो राह समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हुकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,

साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,

जनता की रोके राह, समय में ताव कहाँ?

वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है।

अब्दों, शताब्दियों, सहस्राब्द का अंधकार

बीता; गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं;

यह और नहीं कोई, जनता के स्वप्न अजय

चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।

जनता के क्रोध का क्या परिणाम होता है?

1
वह सत्ता को बदल देती है
2
वह समाज में तनाव उत्पन्न कर देती है
3
वह समाज को अनैतिक बना देती है
4
वह स्वयं के विषय में भी नहीं सोचती है

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