निम्नलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दें।
1857 की क्रांति के अगले वर्ष जारी महारानी विक्टोरिया के सहृदयतापूर्ण घोषणा-पत्र से भारतीय जनता आशांवित हो गयी थी। कुछ सुधार हुए भी, अतएव भारतेंदुकालीन कवियों ने अंग्रेज़ों की प्रशस्तियाँ लिखीं और रानी विक्टोरिया का जयजयकार किया। किंतु छोटे-मोटे सुधारों के अतिरिक्त कुछ नहीं हुआ। आर्थिक दृष्टि से भी अंग्रेज़ों की नीति भारत के लिए अहितकर थी। देश का धन निरंतर बाहर जाने से भारत निर्धन हो गया। सरकार ने उद्योग-धंधों के विकास के लिए भी कुछ नहीं किया। अत्याचारों एवं सर्वतोमुखी विफलता का मुख्य कारण परतंत्रता ही समझ में आया। अत: जनता ने पूर्ण स्वतंत्रता की माँग की। गोखले तथा तिलक-जैसे नेताओं ने क्रमश: ‘स्वराज्य’ एवं ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है' जैसे नारों से चेतना जाग्रत की। अंग्रेज़ों ने शैक्षणिक, धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी कूटनीति से काम लिया। भारतीयों को अंग्रेज़ी शिक्षा दिए जाने का उद्देश्य था - देशवासियों का ऐसा वर्ग खड़ा करना जो शरीर से भारतीय होते हुए भी मन से अंग्रेज़ों का ग़ुलाम हो और उनके शासन में सहायक सिद्ध हो। दूसरी ओर अंग्रेज़ी शिक्षा के माध्यम से भारतवासी बर्क, मिल, स्पेंसर, रूसो आदि विचारकों की रचनाओं के सम्पर्क में आए जिससे राष्ट्रीयता की भावना को बल मिला। उन्नींसवी शताब्दी में ही आर्यसमाज (स्वामी दयानंद, 1875), ब्रह्म समाज (राजा राममोहन राय, 1828), प्रार्थना समाज (महादेव गोविंद रानडे 1867), तथा इंडियन नेशनल कांग्रेस (ए. ओ. ह्यूम 1885) की स्थापना के फलस्वरूप भारतीय सभ्यता, संस्कृति, धर्म और समाज के पुनरुत्थान की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी थी।