Comprehension Passage
सुभद्रा सुमन के रंग-रूप, बात पर ऐसी मोहित हुई कि उसे अपनी गाड़ी में बिठा लिया। वकील साहब कोचबाक्स पर जा बैठे। गाड़ी चली। सुमन को ऐसा मालूम हो रहा था कि वह विमान पर बैठी स्वर्ग को जा रही है। सुभद्रा यद्यपि बहुत रूपवती न थी और उसके वस्त्र भूषण भी साधारण ही थे, पर उसका स्वभाव ऐसा नम्र, व्यवहार ऐसा सरल तथा विनय पूर्ण था कि सुमन का हृदय पुलकित हो गया। रास्ते में उसने अपनी सहेलियों को जाते देखा, खिड़की खोल कर उनकी ओर गर्व से देखा, मानो कह रही थी, तुम्हें भी कभी यह सौभाग्य प्राप्त हो सकता है? पर इस गर्व के साथ ही उसे यह भी डर था कि कहीं मेरा मकान देखकर सुभद्रा मेरा तिरस्कार न करने लगे। जरूर यही होगा। यह क्या जानती है कि मैं ऐसे फटे हाल में रहती हूं। यह कैसी भाग्यवान स्त्री है! कैसा देव रूपी पुरुष है! यह ना आ जाते तो वह निर्दयी चौकीदार ना जाने मेरी क्या दुर्गति करता। कितनी सज्जनता है कि मुझे भीतर बिठा दिया और आप कोचवान के साथ जा बैठे! यह इन्हीं विचारों में मग्न थी कि उसका घर आ गया।

तिरस्कार शब्द के लिए विलोम शब्द होगा?

1
स्वीकार
2
आकार
3
चतुर्भुजाकार
4
निराकार

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