Comprehension Passage
कबीर के काव्य के वर्ण्य विषय आध्यात्मिक विचार हैं, लौकिक भाव नही। आधुनिक विचारों की अभिव्यक्ति भक्ति-क्षेत्र में दार्शनिकों की शुष्क शैली में नही की जा सकती। इसीलिए भक्त-कवि अपने आध्यात्मिक विचारो को विविध सहायक प्रसाधनो के सहारे व्यक्त करते हैं। आत्मा का परमात्मा के प्रति जो भक्ति-सम्बध है, उसकी अभिव्यक्ति लौकिक भाषा में नही हो सकती। भावुक भक्तों ने इसलिए अपने आध्यात्मिक विचारो को व्यक्त करने के लिए प्रतीको, अन्योक्तियो, समासोक्तियो, रूपको और उलटवासियो आदि की शरण ली है। संत -कवियो ने ही ऐसा नही किया है, अनादि काल के सभी भावुक कवि ऐसा करते चले आ रहे हैं। संहिताओं और उपनिषदों आदि में इन सबके उदाहरण मिलते हैं। महात्मा कबीर ने भी अपने आध्यात्मिक विचारों की अभिव्यक्ति के लिए इन सभी सहायक प्रसाधनो का आश्रय लिया है। भारत में प्रतीक पद्धति के विकास को सूफियों से भी प्रेरणा मिली है। सूफी अपने ह्रदय के अनन्य प्रेम को व्यक्त करने के लिए आत्मा और परमात्मा के सम्बध की अभिव्यक्ति के लिए दाम्पत्य प्रेम का प्रतीक कल्पित करते रहे हैं। भक्त लोग भगवान के प्रति पिता और माता का सम्बध सदैव से ही मानते आए हैं। कबीर सूफी साधना से प्रभावित कवि थे। इसलिए उन्होने ईश्वर के प्रति दाम्पत्य और वात्सल्य दोनो प्रकार के प्रतीकों को अपने काव्य में प्रश्रय दिया है। दाम्पत्य प्रतीक के प्रयोग से शुद्ध आध्यात्मिक विचार मधुमयी कोमल भावनाओ के रूप में व्यक्त होते हैं, जिससे काव्य में एक अलौकिक आनंद, एक दिव्य रस स्फुरित होने लगता था। दाम्पत्य प्रेम में विरह और मिलन की मधुर और कोमल परिस्थितियाँ आती है। लौकिक कवियों में इन परिस्थितियो के चित्रण वासना के उद्दीपक प्रतीत होते है जबकि आध्यात्मिक कवियो में रसमयी अलौकिक अभिव्यक्ति में समर्थ होते हैं।
कबीर के काव्य का वर्ण्य विषय है-
1
लौकिक भाव
2
आध्यात्मिक विचार
3
प्रतीक
4
रुमानी परिकल्पनाएँ